
हर साल हम नौ रातों तक मां दुर्गा की पूजा करते हैं, उनके नौ रूपों को सजाते हैं, उपवास रखते हैं, आरती गाते हैं। लेकिन क्या कभी आत्मनिरीक्षण किया है कि इस आराधना का असली मकसद क्या है?
नवरात्रि सिर्फ धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि एक नैतिक जागरूकता का उत्सव है। ये समय है भीतर की शक्ति को पहचानने का — और अधर्म के सामने डट कर खड़े होने का।
धर्म बनाम अधर्म: कहानी सिर्फ पौराणिक नहीं, आज भी जारी है
मां दुर्गा और महिषासुर की कथा प्रतीक है — अच्छाई और बुराई के संघर्ष की। फर्क बस इतना है कि आज का ‘महिषासुर’ अंदर और आसपास दोनों जगह है —
भ्रष्टाचार
अन्याय
अत्याचार
चुप्पी
हमारे सामने जब अधर्म होता है — ऑफिस में, समाज में, रिश्तों में — तो क्या हम बिना नुकसान गिने उसका सामना करते हैं?
इस बार नवरात्रि में एक संकल्प लें
“मैं अधर्म को देखकर चुप नहीं रहूंगा, चाहे मेरी चुप्पी से मुझे लाभ मिल रहा हो, या मेरी आवाज़ उठाने से कुछ खोने का डर हो।”
क्योंकि याद रखिए, अधर्म तब नहीं बढ़ता जब बुरे लोग सक्रिय होते हैं, बल्कि तब जब अच्छे लोग चुप रहते हैं।

मां दुर्गा की आराधना सिर्फ दीप जलाने से नहीं होती, बल्कि तब होती है जब आप किसी गलत को देखकर “मुझे क्या” की बजाय “मैं क्यों नहीं?” सोचते हैं। अगली बार अगर कोई महिला परेशान हो, अगर कोई कमजोर मज़लूम चुपचाप सह रहा हो, अगर कोई बच्चा शोषण का शिकार हो रहा हो, तो सिर्फ “मन ही मन प्रार्थना” मत कीजिए — खड़े हो जाइए!
नवरात्रि की असली आरती: साहस की लौ जलाइए
आपका साहस ही सच्ची पूजा है। आपकी आवाज़ ही असली मंत्र है। आपका स्टैंड लेना ही धर्म की स्थापना है। इस बार नवरात्रि में सिर्फ भोग नहीं, वचन भी दीजिए। केवल मां के चित्र के सामने नहीं, जीवन के हर मोड़ पर उनका रूप बन जाइए।
पूजा घर से बाहर भी होनी चाहिए
नवरात्रि के नौ दिन बीत जाएंगे, मंदिरों की भीड़ छंट जाएगी, लेकिन सवाल ये है — क्या आपके भीतर की देवी जागी?
क्या आपने सच में अधर्म के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत दिखाई?
अगर हां, तो यही है नवरात्रि की असली विजय —धर्म का आपके भीतर पुनर्जन्म।
“राशन के नाम पर चल रही थी ‘आधार की अद्भुत लीला’
