
जब एकनाथ शिंदे ने शिवसेना से अलग होकर नया गुट बनाया था, तब मुंबई की राजनीति में सबसे बड़ा झटका उद्धव ठाकरे गुट (SS-UBT) को लगा। उस दौर में शिवसेना के 80–82 नगरसेवक शिंदे के साथ चले गए, और ऐसा लगने लगा कि मुंबई की शिवसेना अब दो हिस्सों में नहीं, बल्कि एकतरफा बिखर चुकी है।
लेकिन राजनीति में अंतिम फैसला हमेशा चुनाव करता है—बयान नहीं।
BMC चुनाव: नए चेहरे, पुराना भरोसा
इस बार हुए BMC चुनाव में उद्धव गुट ने रणनीति बदली। ज्यादातर नए उम्मीदवार मैदान में उतारे गए। जो कदम जोखिम भरा माना जा रहा था, वही अब उद्धव गुट की सबसे बड़ी ताकत बनता दिखा।
मतदाताओं ने साफ संदेश दिया— चेहरा नया हो सकता है, लेकिन ब्रांड पुराना ही चलेगा।
आंकड़ों की राजनीति: असली खेल यहीं है
अगर नतीजों को ठंडे दिमाग से देखा जाए, तो तस्वीर बेहद साफ है:
- Shiv Sena (Shinde) – मुंबई में 27 सीटें
- Shiv Sena (UBT) – मुंबई में 72 सीटें
यानी जिस मुंबई को कभी शिंदे गुट की सबसे बड़ी ताकत बताया जा रहा था, वहीं उद्धव ठाकरे गुट तीन गुना आगे निकल गया। यहां नाम किसके पास है, ये कोर्ट तय करेगा; भरोसा किसके पास है, ये वोटर ने तय कर दिया।

मुंबई का फैसला: ‘असली’ शिवसेना कौन?
BMC नतीजों के बाद यह बहस फिर ज़िंदा है कि असली शिवसेना कौन-सी है। राजनीतिक तौर पर देखें तो मुंबई ने संकेत दे दिया है कि पार्टी टूट सकती है नेता बदल सकते हैं लेकिन कोर वोटबेस याददाश्त नहीं बदलता।
मुंबई की राजनीति में आज भी शिवसेना की पहचान अगर किसी के साथ मजबूती से खड़ी दिखती है, तो वह है SS-UBT।
राजनीतिक संदेश: बगावत से सत्ता मिल सकती है, लेकिन जड़ें नहीं
शिंदे गुट के लिए यह नतीजा एक चेतावनी है— सरकार में होना और शहर में स्वीकार्यता होना, दोनों अलग चीज़ें हैं। उद्धव गुट के लिए यह चुनाव सिर्फ सीटों की जीत नहीं, बल्कि यह संदेश है कि मुंबई की शिवसेना की आत्मा अभी भी उनके साथ है।
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