
1971 की इस क्लासिक फिल्म में धर्मेन्द्र ने किया है ऐसा अभिनय, मानो जैकी चैन और दिलीप कुमार की आत्मा एक साथ घुस आई हो।
नायक अजीत पहले चोर है, फिर खेतों में मेहनती मज़दूर, फिर आशा पारेख, और फिर आखिरकार राइफल वाला रॉबिनहुड।
विनोद खन्ना अपने खलनायकी के करियर की शानदार शुरुआत करते हैं, और ऐसा लगता है जैसे वो कह रहे हों – “गब्बर आने वाला है, लेकिन तब तक मैं ही काफी हूँ।”
रोमांस: खेतों में प्यार, बैकग्राउंड में बख्शी
अंजू (आशा पारेख) और अजीत की लव स्टोरी में है बैकग्राउंड में सावन, बारिश, लता की आवाज़ और सामने धर्मेन्द्र की शर्मीली मुस्कान।
गाना – “कुछ कहता है ये सावन” आज भी मन में वही 70s की सीपिया फीलिंग भर देता है।
संगीत: जब लता-रफ़ी की जोड़ी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का जादू एक साथ हो
गीतकार आनंद बख्शी और संगीतकार लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने वो कर दिखाया जो आजकल की रीमिक्स इंडस्ट्री चाह कर भी नहीं कर पाती —
“मार दिया जाए या छोड़ दिया जाए…” – इस एक लाइन ने मानो 70 के दशक की सस्पेंस को नए स्तर पर पहुँचा दिया।
धर्मेन्द्र Vs विनोद खन्ना — बिना VFX के असली दंगल
आज की फिल्मों में एक पंच मारने पर विलेन 50 फुट दूर उड़ता है। लेकिन 1971 में, धर्मेन्द्र बस आँखें दिखाते थे, और दर्शक खुद ही डर जाते थे।
अजीत और जब्बार सिंह के बीच का आमना-सामना फिल्म का क्लाइमेक्स नहीं, बल्कि डायलॉगबाज़ी का धर्म युद्ध है।

पुरस्कार और पहचान: धर्मेन्द्र को मिला नामांकन और दर्शकों का दिल
हालाँकि धर्मेन्द्र को फिल्मफेयर में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का अवॉर्ड नहीं मिला, लेकिन जनता ने उन्हें “गाँव का रॉकस्टार” पहले ही घोषित कर दिया था।
कह सकते हैं — “Award न सही, Reward तो पब्लिक ने दे दिया।”
देसी माटी से निकली एक सिनेमाई मिसाल
“मेरा गाँव मेरा देश” सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक आंदोलन था उन फिल्मों का, जिसमें नायक चोर से हीरो बनता है, नायिका बिना इंस्टाग्राम फिल्टर के सुंदर दिखती है, और खलनायक डायलॉग से डराता है, बम से नहीं।
अगर ये फिल्म आज बनती तो – अजीत का नाम बदलकर “AJ Da Criminal” होता, अंजू एक इंस्टा इन्फ्लुएंसर होती, और जब्बार सिंह एक टॉप ट्रेंडिंग रील बनाकर धमकी देता।
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