
Manish Tewari ने ईरान पर US-इज़राइल ऑपरेशन को खाड़ी देशों और पूरे मिडिल ईस्ट के लिए “गंभीर रूप से अस्थिर करने वाला पल” बताया है। उनका कहना है कि जब अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत चल रही थी जिसे खासकर Oman सपोर्ट कर रहा था तब सैन्य कार्रवाई का फैसला चौंकाने वाला है।
तिवारी का इशारा साफ है कूटनीति की मेज़ अभी खाली नहीं हुई थी, फिर भी मिसाइलों ने बोलना शुरू कर दिया।
बातचीत बनाम बमबारी
जिनेवा में लंबी वार्ता, बैक-चैनल डिप्लोमेसी, और GCC देशों की मध्यस्थता ये सब अचानक “ऑपरेशन मोड” में क्यों बदल गया?
तिवारी ने कहा कि ऐसे ऑपरेशन महीनों की प्लानिंग से होते हैं। यानी फैसला अचानक नहीं था। उनके मुताबिक, सवाल यह भी है कि जब भारत के प्रधानमंत्री इज़राइल दौरे पर थे, तब क्या नई दिल्ली को इस संभावित कार्रवाई की भनक थी?
भारत के लिए क्यों चिंता?
भारत का ऐतिहासिक रुख दो-राष्ट्र समाधान और फ़िलिस्तीन को राज्य का दर्जा देने के समर्थन में रहा है। India के लिए दुविधा यही है रणनीतिक साझेदारी बनाम नैतिक पोज़िशन।
खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों भारतीयों का ज़िक्र करते हुए तिवारी ने कहा कि अगर हालात बिगड़ते हैं, तो सबसे पहले असर डायस्पोरा पर पड़ेगा।

GCC की धड़कन तेज
Gulf Cooperation Council (GCC) पहले ही क्षेत्रीय तनाव से जूझ रहा है। अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो ऊर्जा बाजार, शिपिंग रूट और रेमिटेंस—सब पर असर पड़ेगा।
कूटनीति की कॉफी ठंडी, मिसाइलें गरम
दुनिया की राजनीति में “स्ट्रेटेजिक सरप्राइज” नया ट्रेंड है। पहले बातचीत, फिर बयान, फिर हमला—और फिर “हम तो शांति चाहते थे” वाला क्लासिक डायलॉग। सवाल यह नहीं कि हमला क्यों हुआ। सवाल यह है कि जब बातचीत चल रही थी, तब ट्रिगर किसने दबाया और किसे पहले से पता था?
भारत के लिए यह शतरंज की बिसात है, जहाँ हर चाल का असर सीमा से बहुत दूर बैठे भारतीय परिवारों तक जाएगा।
दिल्ली शराब नीति केस में केजरीवाल-सिसोदिया बरी
