
सनातन धर्म की दो प्रमुख पीठों के बीच चल रहा टकराव अब कानूनी मोड़ ले चुका है। प्रयागराज की एडीजे कोर्ट के आदेश पर जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के खिलाफ POCSO एक्ट के तहत एफआईआर दर्ज की गई है।
झूंसी थाने में दर्ज इस मुकदमे में उनके शिष्य मुकुंदानंद ब्रह्मचारी और कुछ अज्ञात लोगों के नाम भी शामिल हैं। मामला अब आस्था से आगे बढ़कर विधिक जांच के दायरे में है।
कौन हैं महंत आशुतोष ब्रह्मचारी?
रिपोर्ट्स के अनुसार, महंत आशुतोष ब्रह्मचारी का पूर्व नाम अश्विनी पांडेय बताया जाता है। वे शामली जिले के कांधला क्षेत्र से जुड़े हैं। पुलिस रिकॉर्ड में उनका नाम विभिन्न मामलों में दर्ज रहा है। स्थानीय पुलिस दस्तावेजों के मुताबिक वे कभी हिस्ट्रीशीटर सूची में भी शामिल रहे।
यह पृष्ठभूमि विवाद को और जटिल बनाती है, क्योंकि आरोप लगाने वाला और आरोप झेलने वाला दोनों ही सार्वजनिक दायरे में प्रभावशाली धार्मिक चेहरे हैं।
अश्विनी से आशुतोष तक का सफर
बताया जाता है कि 2022 में उन्होंने दीक्षा लेकर ‘आशुतोष ब्रह्मचारी’ नाम ग्रहण किया। वर्तमान में वे मथुरा में सक्रिय हैं और खुद को ‘श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट’ से जोड़ते हैं।
धार्मिक पहचान के साथ उनका सार्वजनिक कद बढ़ा, लेकिन विवादों की परछाईं भी साथ चलती रही।
विवाद की जड़ क्या है?
महंत आशुतोष ब्रह्मचारी ने कोर्ट में आरोप लगाया कि वाराणसी स्थित विद्या मठ आश्रम में नाबालिगों के साथ यौन शोषण हुआ। उन्होंने अदालत में कथित सबूत प्रस्तुत किए। दूसरी ओर, शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए इसे साजिश बताया है।

अब मामला पुलिस जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। सत्य अदालत में तय होगा, बयानबाजी में नहीं।
आध्यात्मिक मंच अदालत की फाइलों में बदल जाए, तो बहस सिर्फ सिद्धांतों की नहीं रहती। यह मामला बताता है कि आज की दुनिया में चोला बदलने से अतीत नहीं बदलता, और आरोप लगाने से सत्य स्वतः स्थापित नहीं होता।
धर्म, राजनीति और कानून — तीनों की सीमाएं जब टकराती हैं, तो सुर्खियां बनती हैं।
फिलहाल जांच जारी है और कोई भी पक्ष दोषी या निर्दोष घोषित नहीं हुआ है। कानून की प्रक्रिया अपना रास्ता लेगी। आस्था और आरोप — दोनों का फैसला अदालत में होगा।
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