कुंडा का किला हिलेगा क्या? राजा भैया, अखिलेश और टिकट की सियासी मुस्कान

साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कुछ सीटें permanent headline material होती हैं—प्रतापगढ़ की कुंडा विधानसभा उन्हीं में से एक है। यहां चुनाव सिर्फ वोटों की गिनती नहीं, बल्कि power, perception और पकड़ की परीक्षा होते हैं। हर election से पहले चर्चा होती है, हर election के बाद निष्कर्ष वही—राजा भैया जीत जाते हैं

Raja Bhaiya Ka ‘Unbreakable Fort’

जनसत्ता दल (लोकतांत्रिक) के प्रमुख रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया के लिए कुंडा सिर्फ constituency नहीं, बल्कि political identity है।
BJP, SP, BSP—सबने कोशिश की, लेकिन किला फतह नहीं हुआ। तीन दशक, कई सरकारें और अनगिनत रणनीतियां… नतीजा?
Status quo intact.

Akhilesh Yadav Ka जवाब: मुस्कान में छुपा मैसेज

लखनऊ में प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जब Akhilesh Yadav से पूछा गया कि क्या कुंडा से Jyotsna Singh को टिकट मिलेगा, तो जवाब आया— “आप टिकट क्यों बांट रहे हैं? अभी बहुत समय है…”

यह जवाब जितना हल्का लगा, उतना ही politically loaded भी था। Message साफ था- Kunda is under रिव्यु।  कुछ पक रहा है, लेकिन ढक्कन अभी नहीं खुलेगा।

Who Is Jyotsna Singh? नाम क्यों गूंज रहा है

ज्योत्सना सिंह प्रतापगढ़ की स्थानीय नेता हैं, Amity University Lucknow से journalism पढ़ चुकी हैं और 2016 से Samajwadi Party में सक्रिय हैं। उनके पिता राजकुमार सिंह, सदर सीट से पूर्व ब्लॉक प्रमुख रह चुके हैं।
यानि— Local कनेक्ट, Political lineage, संगठनात्मक अनुभव।

यही combination उन्हें serious contender बनाता है—कम से कम चर्चा के स्तर पर।

‘Kunda Mein Kundi’—नारा पुराना, इरादा नया?

पिछले चुनाव में अखिलेश यादव का नारा था— “कुंडा में कुंडी लगाओ” तब नारा चला, लेकिन नतीजा नहीं बदला। Political observers मानते हैं कि उसी वक्त से SP ने long-term groundwork शुरू किया। इस बार रणनीति slogan-based नहीं, micro-planning driven हो सकती है।

सवाल सिर्फ जीत का नहीं

कुंडा की राजनीति में असली सवाल ये नहीं कि राजा भैया जीतेंगे या नहीं बल्कि सवाल ये है— क्या कोई पार्टी पहली बार narrative बदल पाएगी?

क्योंकि कुंडा में चुनाव नहीं, इतिहास repeat होता है… और इतिहास बदलना सबसे मुश्किल political project होता है।

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