
कोलकाता के जादवपुर विधानसभा क्षेत्र से सामने आया एक मामला अब सिर्फ एक आत्महत्या की खबर नहीं रह गया है। बूथ संख्या 110 के बूथ लेवल ऑफिसर (BLO) अशोक दास की मौत ने बंगाल की चुनावी व्यवस्था, प्रशासनिक दबाव और सत्ता-संरचना पर uncomfortable सवाल खड़े कर दिए हैं।
यह कहानी सिस्टम की है—जहाँ नियम किताबों में सुरक्षित हैं, लेकिन ज़मीन पर डर में जीते हैं।
परिवार का आरोप: “काम करो, लेकिन ज़्यादा ईमानदार मत बनो”
परिजनों के मुताबिक, अशोक दास पर लगातार यह दबाव डाला जा रहा था कि वे मतदाता सूची से संदिग्ध और अवैध नाम हटाने की प्रक्रिया को धीमा करें या रोक दें।
आरोप है कि जब उन्होंने नियमों के मुताबिक काम करने की कोशिश की, तो बात सिर्फ ट्रांसफर या शिकायत तक सीमित नहीं रही—परिवार को नुकसान पहुंचाने की कथित धमकियां दी गईं।
यहीं से एक सरकारी कर्मचारी का प्रोफेशनल दायित्व, निजी डर में बदल गया।
राजनीतिक आरोप: नाम नहीं, सिस्टम सवालों के घेरे में
मामले में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की पार्षद अनन्या बनर्जी और एक बूथ लेवल एजेंट (BLA) का नाम सामने आ रहा है। आरोपों की अभी जांच होनी बाकी है, लेकिन सवाल यह है— क्या चुनावी मशीनरी अब निष्पक्ष नहीं, बल्कि ‘मैनेजमेंट सिस्टम’ बनती जा रही है?
यह वही बिंदु है जहाँ लोकतंत्र और राजनीतिक सुविधा आमने-सामने खड़े दिखते हैं।
ऑडियो क्लिप: एक पत्नी की आवाज़, पूरे सिस्टम पर सवाल
अशोक दास की पत्नी द्वारा जारी किया गया ऑडियो संदेश इस पूरे मामले को एक अलग ही स्तर पर ले जाता है। ऑडियो में डर है, असहायता है और वह सवाल है जो अक्सर फाइलों में दब जाता है— “अगर सरकारी कर्मचारी भी सुरक्षित नहीं, तो नियम लागू करेगा कौन?”

यह ऑडियो भावनात्मक अपील से ज़्यादा, एक संभावित जांच का ट्रिगर पॉइंट बन चुका है।
चुनाव, प्रशासन और डर की राजनीति
इस घटना के बाद जादवपुर इलाके में गुस्सा है और विपक्ष इसे लोकतंत्र पर हमला बता रहा है। असल बहस अब TMC बनाम विपक्ष से आगे बढ़ चुकी है। मुद्दा यह है कि क्या BLO जैसे अधिकारी स्वतंत्र होकर काम कर पा रहे हैं? क्या वोटर लिस्ट सुधार अब “राजनीतिक जोखिम” बन चुका है? और क्या चुनावी पारदर्शिता सिर्फ प्रेस रिलीज़ तक सीमित रह गई है?
फिलहाल आधिकारिक जांच की मांग तेज हो रही है। सभी पक्षों की भूमिका की निष्पक्ष और गहन जांच की बात कही जा रही है।
अगर आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला किसी एक पार्टी या व्यक्ति तक सीमित नहीं रहेगा—यह पूरी चुनावी प्रक्रिया पर सवालिया निशान होगा।
क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक चीज़ विरोध नहीं, डर में किया गया पालन होता है।
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