तेल का टेंशन: होरमुज बंद तो भारत का प्लान-B ऑन! रूस फिर ‘दोस्त’ बनेगा?

सैफी हुसैन
सैफी हुसैन, ट्रेड एनालिस्ट

दुनिया की सबसे संवेदनशील समुद्री पट्टियों में से एक Strait of Hormuz में बढ़ता तनाव सिर्फ क्षेत्रीय मसला नहीं है। भारत जैसे देश, जो अपनी 84-90% कच्चे तेल की जरूरत आयात से पूरी करते हैं, सीधे इसकी चपेट में आते हैं।

इराक, सऊदी अरब और UAE से आने वाला बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से गुजरता है। अगर यहां रुकावट आती है, तो असर सिर्फ टैंकरों पर नहीं, सीधे पेट्रोल पंप और रसोई तक पहुंचेगा।

भारत का प्लान-B

Energy experts का कहना है कि भारत तुरंत अपनी Diversification Strategy तेज करेगा।

संभावित विकल्प:

  • अमेरिका
  • पश्चिम अफ्रीका (नाइजीरिया, अंगोला)
  • लैटिन अमेरिका (ब्राजील, गुयाना)

इन रूट्स को होरमुज से होकर नहीं गुजरना पड़ता। हालांकि, लंबा समुद्री रास्ता मालभाड़ा बढ़ा सकता है और अंततः इसका बोझ उपभोक्ता पर आ सकता है।

आपात भंडार: कितने दिन का सहारा?

भारत के पास रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार मौजूद हैं  विशाखापत्तनम, मंगलुरु, पादुर। इन भूमिगत गुफाओं में रखा स्टॉक करीब 9.5 दिन की जरूरत पूरी कर सकता है।

इसके अलावा भारतीय रिफाइनरियों के पास लगभग 10-15 दिन का operational stock रहता है। मतलब panic की स्थिति नहीं, लेकिन लंबा संकट हुआ तो pressure बढ़ना तय है।

रूस: फिर से ‘Savior’?

Russia पिछले दो वर्षों में भारत का प्रमुख डिस्काउंट सप्लायर रहा है। हाल के महीनों में geopolitical balancing के कारण आयात कुछ कम हुआ था, लेकिन मौजूदा हालात में रूस फिर से बड़ा रोल निभा सकता है।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि हिंद महासागर में कुछ रूसी टैंकर floating storage के रूप में मौजूद हैं। जरूरत पड़ने पर भारत इन्हें डायवर्ट कर सकता है।

लेकिन फर्क ध्यान रखिए  रूस से तेल आने में 25-30 दिन। खाड़ी देशों से सिर्फ 5-7 दिन। इसलिए timing critical होगी।

क्या $100 पार जाएगा तेल?

अंतरराष्ट्रीय बाजार में panic buying शुरू हो चुकी है। Analysts का मानना है कि कीमतें $100 प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। War Risk Premium 50% तक बढ़ चुका है। Insurance महंगा, freight महंगा, डॉलर मजबूत तीनों मिलकर भारत का import bill बढ़ा सकते हैं।और जब डॉलर की मांग बढ़ेगी, तो रुपया दबाव में आएगा। असर? महंगा पेट्रोल, महंगा डीजल, और महंगा ट्रांसपोर्ट।

सबसे बड़ी चिंता: LPG और LNG

कच्चे तेल के विकल्प हैं, लेकिन LPG और LNG में भारत की निर्भरता खाड़ी देशों, खासकर Qatar और UAE पर अधिक है। यहां strategic reserves सीमित हैं। अगर आपूर्ति बाधित होती है, तो रसोई गैस की कीमतों पर सीधा असर पड़ सकता है।

कार की टंकी भले किसी तरह भर जाए, लेकिन सिलेंडर खाली हुआ तो गुस्सा ज्यादा होगा।

ग्राउंड रियलिटी: सरकार की परीक्षा

दिल्ली के ऊर्जा मंत्रालय से लेकर मुंबई की रिफाइनरियों तक emergency meetings चल रही हैं। Official stance साफ है “जहां सस्ता तेल मिलेगा, भारत वहां से खरीदेगा।”

लेकिन global energy market में सस्ता और स्थिर दोनों साथ मिलना दुर्लभ है।

तेल सिर्फ ईंधन नहीं, चुनावी मुद्दा भी

भारत में तेल की कीमतें सिर्फ आर्थिक मसला नहीं होतीं, political barometer भी होती हैं। तेल महंगा हुआ तो विपक्ष सवाल उठाएगा। सस्ता रहा तो सरकार क्रेडिट लेगी।

Hindustan की energy security अब सिर्फ टैंकरों की स्पीड पर नहीं, diplomatic balancing पर टिकी है।

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