ग्वालियर में महिला पेंटिंग में प्राइवेट पार्ट्स से छेड़छाड़ पर विवाद

सत्येन्द्र सिंह ठाकुर
सत्येन्द्र सिंह ठाकुर

ग्वालियर में महिला की पेंटिंग के साथ की गई आपत्तिजनक छेड़छाड़ ने यह साफ कर दिया कि यह कोई मामूली शरारत नहीं, बल्कि महिलाओं के प्रति घिनौनी मानसिकता का खुला प्रदर्शन है।
शहर की दीवारों पर बनी कलात्मक पेंटिंग्स को निशाना बनाना न सिर्फ कला का अपमान है, बल्कि समाज की सोच पर भी बड़ा सवाल है।

पेंटिंग नहीं, सोच पर हमला

जिस पेंटिंग को महिला सम्मान और सार्वजनिक कला के प्रतीक के तौर पर देखा जा रहा था, वही कुछ लोगों के लिए विकृत सोच निकालने का ज़रिया बन गई।
यह घटना बताती है कि महिलाएं तो क्या, अब महिला की तस्वीरें भी सुरक्षित नहीं हैं।

प्रशासन की त्वरित कार्रवाई, लेकिन सवाल बाकी

घटना के बाद प्रशासन ने पेंटिंग्स हटाकर दीवारों को सफेद करवा दिया। दीवारें जरूर साफ हो गईं, लेकिन बड़ा सवाल अब भी हवा में तैर रहा है— क्या सोच को भी ब्रश से पेंट किया जा सकता है?

रंग मिटा देना आसान है, पर मानसिकता का रंग इतना पक्का है कि वो हर सफेद दीवार पर फिर उभर आता है।

दोषियों पर कार्रवाई क्यों नहीं?

इस पूरे मामले में Credits @ashihoops को उनके आर्टवर्क और मुद्दा उठाने के लिए समर्थन भी मिला।

यह मामला सिर्फ दीवारों का नहीं, दिमागों की सफेदी का है। जब तक मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक हर शहर में दीवारें तो सफेद होंगी—लेकिन सोच बदरंग ही रहेगी।

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