“ग़ज़लें बोलीं, दाद बरसी!” — फ़िराक़ की याद में गोरखपुर बना अदब की राजधानी

गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

उर्दू अदब के सितारे रघुपत सहाय ‘फ़िराक़ गोरखपुरी’ की जयंती पर गुरुवार को गोरखपुर की शाम शायरी और ग़ज़लों के रंग में रंगी नजर आई।
फ़िराक़ लिटरेरी फ़ाउंडेशन की ओर से अध्यक्ष अरशद जमाल समानी के आवास पर एक भव्य काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसमें शहर और देश भर के शायरी प्रेमियों ने हिस्सा लिया।

महफ़िल में गूंजे जज़्बात, ग़ज़लों में डूबी रूहें

महफ़िल की अध्यक्षता की अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त शायर और संपादक डॉ. कलीम कैसर ने। विशिष्ट अतिथि रहे डॉ. रहमत अली और इंजीनियर तनवीर सलीम, जिनकी यादों ने फ़िराक़ साहब को और जीवंत बना दिया।
डॉ. रहमत अली ने कहा:

“फ़िराक़ साहब जब अलीगढ़ आते थे तो मुशायरे के मंच पर उनकी आवाज़ और लहजा आज भी कानों में गूंजता है।”

लखनऊ की यादें, गोरखपुर की गरिमा

इंजीनियर तनवीर सलीम ने साझा किया कि वे अपने पिता के साथ लखनऊ के मुशायरों में जाया करते थे। वहीं पहली बार फ़िराक़ साहब को मंच पर सुना —

“आज भी उनकी आवाज़ और शख़्सियत मेरे ज़ेहन में ज़िंदा है।”

गोरखपुर और फ़िराक़ – मिट्टी का रिश्ता

फ़ाउंडेशन अध्यक्ष अरशद जमाल समानी ने कहा:

“फ़िराक़ साहब गोरखपुर की मिट्टी से जुड़े हैं। उनका साहित्य नई पीढ़ियों तक पहुँचना चाहिए। यही हमारा कर्तव्य है।”

अशआरों की गूंज, वाह-वाह की बौछार

ग़ज़लें, नज़्में और अशआर जैसे ही पेश किए गए, श्रोता ‘वाह-वाह’ और ‘मुकर्रर’ के साथ देर रात तक झूमते रहे।
कई शायरों ने फ़िराक़ साहब को अपने-अपने अंदाज़ में श्रद्धांजलि दी।

गोरखपुर की शायरी विरासत जिंदा है

इस आयोजन ने एक बार फिर साबित किया कि गोरखपुर ना सिर्फ़ फ़िराक़ का शहर है, बल्कि अदब की परंपरा का जीवंत केंद्र भी है।

फ़िराक़ साहब की जयंती पर इस महफ़िल ने गोरखपुर की सांस्कृतिक आत्मा को फिर से आवाज़ दी। ग़ज़लें हों या ज़ज्बात, हर एक शेर ने ज़मीर से जुड़कर फ़िराक़ की रूह को सलाम किया।

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