महंगा किराया, फिर भी VIP के लिए दो कतारें रिजर्व! इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में आम लोगों की सीटों पर ‘आरक्षण’ क्यों?

लखनऊ: राजधानी के प्रतिष्ठित इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में कार्यक्रम आयोजित करना पहले ही आयोजकों की जेब पर भारी पड़ता है, लेकिन अब एक सरकारी आदेश ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। लाखों रुपये किराया लेने के बावजूद लखनऊ विकास प्राधिकरण ने निर्देश जारी किया है कि ऑडिटोरियम की पहली दो कतारों (ए और बी) की बुकिंग नहीं की जाएगी। सवाल उठ रहे हैं कि जब पूरा हॉल किराये पर दिया जाता है तो आखिर आम दर्शकों की सबसे बेहतर सीटें किसके लिए खाली रखी जाती हैं?

लाखों का किराया, फिर भी आयोजकों पर शर्तें

इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान के जुपिटर, मार्स, मर्करी और प्लूटो ऑडिटोरियम का किराया पहले से ही काफी ऊंचा है। 1500 क्षमता वाले जुपिटर ऑडिटोरियम की कुल बुकिंग राशि जीएसटी और जमानत राशि सहित 4.36 लाख रुपये से अधिक है। वहीं 600 क्षमता वाले मार्स हॉल के लिए 2.17 लाख रुपये, 400 क्षमता वाले मर्करी हॉल के लिए 1.82 लाख रुपये और 200 क्षमता वाले प्लूटो मीडिया सेंटर के लिए 1.47 लाख रुपये से अधिक का भुगतान करना पड़ता है। इतनी बड़ी राशि लेने के बाद भी आयोजकों को अपनी मर्जी से सभी सीटें आवंटित करने का अधिकार नहीं दिया जा रहा है।

एलडीए के आदेश ने खड़े किए सवाल

16 मई 2026 को लखनऊ विकास प्राधिकरण के उपाध्यक्ष प्रथमेश कुमार की ओर से जारी आदेश में स्पष्ट निर्देश दिया गया कि सांस्कृतिक कार्यक्रमों की बुकिंग के दौरान ऑडिटोरियम की पहली दो पंक्तियों ए और बी में कोई बुकिंग नहीं की जाएगी। आदेश में यह भी कहा गया कि अतिरिक्त बैठने की व्यवस्था केवल प्राधिकरण के उच्च अधिकारियों की अनुमति से ही की जाएगी। आदेश में सुरक्षा व्यवस्था का हवाला दिया गया है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं किया गया कि यदि पूरा ऑडिटोरियम किराये पर दिया जा रहा है तो सबसे महत्वपूर्ण सीटों को आम दर्शकों के लिए बंद रखने की आवश्यकता क्यों है।

आयोजकों के बीच बढ़ रही नाराजगी

आयोजकों का कहना है कि लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी उन्हें अपनी आवश्यकता के अनुसार सीट आवंटित करने की स्वतंत्रता नहीं मिलती। पहली दो कतारें खाली रखने की शर्त के कारण मुख्य अतिथियों, विशिष्ट मेहमानों और प्रायोजकों की बैठने की व्यवस्था प्रभावित होती है। कई आयोजकों का सवाल है कि यदि पूरा हॉल किराये पर दिया जाता है तो फिर VIP सीटों का नियंत्रण एलडीए अपने पास क्यों रखता है?

क्या VIP संस्कृति अब भी हावी?

सरकारी सभागारों में VIP संस्कृति को समाप्त करने की बातें लंबे समय से होती रही हैं, लेकिन इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान का यह आदेश ठीक उलटी तस्वीर पेश करता है। पहली दो कतारों को पहले से खाली रखने के निर्देश ने यह बहस छेड़ दी है कि आखिर इन सीटों का वास्तविक उपयोग किसके लिए किया जाता है।

पारदर्शिता पर उठ रहे सवाल

आदेश में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि किन परिस्थितियों में इन सीटों का उपयोग होगा, किसे बैठाया जाएगा और यदि कोई VIP नहीं आता है तो क्या ये सीटें पूरी तरह खाली रहेंगी। ऐसे में पारदर्शिता और संसाधनों के उपयोग को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं। यदि यह व्यवस्था केवल सुरक्षा कारणों से लागू की गई है तो विशेषज्ञों का मानना है कि इसके लिए विस्तृत मानक संचालन प्रक्रिया सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि आयोजकों और आम लोगों के बीच किसी प्रकार का भ्रम न रहे।

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