
पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी में मंच सजा था, संथाल समाज का बड़ा कार्यक्रम था और देश की राष्ट्रपति वहां मौजूद थीं। लेकिन कार्यक्रम खत्म होते-होते एक राजनीतिक संदेश हवा में तैरने लगा।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंच से ही अपनी नाराज़गी जाहिर कर दी न सिर्फ कार्यक्रम स्थल को लेकर, बल्कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की गैरमौजूदगी पर भी। बातें शालीन थीं, लेकिन संदेश बेहद साफ था।
संथाल सम्मेलन में पहुंचीं राष्ट्रपति
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शनिवार को इंटरनेशनल संथाल काउंसिल के कार्यक्रम में हिस्सा लेने पश्चिम बंगाल पहुंचीं। यह सम्मेलन सिलीगुड़ी महकमा परिषद के फांसीदेवा इलाके में आयोजित किया गया था। कार्यक्रम का मकसद संथाल समाज से जुड़े मुद्दों और सांस्कृतिक पहचान को सामने लाना था।
लेकिन मंच से राष्ट्रपति ने जो कहा, उसने पूरे कार्यक्रम को अचानक राजनीतिक चर्चा में ला दिया।
“जगह छोटी थी”… इस दलील पर उठाया सवाल
राष्ट्रपति ने कहा कि उन्हें बताया गया था कि विधाननगर मैदान छोटा है, इसलिए कार्यक्रम फांसीदेवा में रखा गया। लेकिन जब वह बाद में विधाननगर मैदान पहुंचीं तो हैरान रह गईं। उनके मुताबिक यह जगह इतनी बड़ी है कि यहां करीब पांच लाख लोग इकट्ठा हो सकते हैं।
राष्ट्रपति ने सवाल उठाया जब इतनी बड़ी जगह उपलब्ध थी, तो सम्मेलन वहां क्यों नहीं कराया गया?

“संथाल लोग ज्यादा न पहुंचें?” — राष्ट्रपति का इशारा
अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने एक गंभीर संकेत भी दिया। उन्होंने कहा कि ऐसा लगता है कि प्रशासन शायद नहीं चाहता था कि बड़ी संख्या में संथाली लोग कार्यक्रम में पहुंचें। उनकी बातों से साफ झलक रहा था कि कार्यक्रम के आयोजन को लेकर वह संतुष्ट नहीं थीं।
ममता बनर्जी की गैरमौजूदगी पर भी जताया दुख
राष्ट्रपति मुर्मू ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की गैरमौजूदगी पर भी नाराज़गी जताई। उन्होंने कहा कि आम तौर पर जब राष्ट्रपति किसी राज्य में आते हैं तो मुख्यमंत्री और मंत्री कार्यक्रम में मौजूद रहते हैं। लेकिन इस बार ऐसा नहीं हुआ।
राष्ट्रपति ने कहा, “मैं भी बंगाल की बेटी हूं। ममता मेरी छोटी बहन हैं। शायद किसी बात का गुस्सा होगा… लेकिन कोई गिला-शिकवा नहीं है।”
राजनीति में चर्चा तेज
राष्ट्रपति के इस बयान के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नई चर्चा शुरू हो गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मंच से कही गई यह बातें भले ही शालीन भाषा में थीं, लेकिन उनका राजनीतिक संदेश साफ था। अब सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही थी या इसके पीछे कोई राजनीतिक असहजता भी छिपी थी।
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