उपराष्ट्रपति धनखड़ का इस्तीफा: विपक्ष की सहानुभूति या विधवा विलाप?

सुरेन्द्र दुबे ,राजनैतिक विश्लेषक
सुरेन्द्र दुबे ,राजनैतिक विश्लेषक

जगदीप धनखड़ ने जब अचानक उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा दिया, तो राजनीति का पारा भी उनके स्वास्थ्य की तरह ऊपर-नीचे होने लगा। विपक्ष ने बिना ECG रिपोर्ट देखे तुरंत कह दिया — “इसमें कुछ तो गड़बड़ है!”

अविश्वास से “आप महान हैं सर” तक — विपक्ष की भावनात्मक जिम्नास्टिक

यही विपक्ष जो दिसंबर में धनखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया था — आज वही उन्हें “संवेदनशील”, “मर्यादित” और “किसान हितैषी” बता रहा है। सवाल ये है कि क्या इन नेताओं की याददाश्त 14 दिन के नोटिस से भी छोटी है?

विपक्ष की Acting Class: स्क्रिप्ट वही, इमोशन्स बदलते रहते हैं

जयराम रमेश ने कहा, “धनखड़ ने मर्यादाओं की रक्षा की” — जबकि चंद महीने पहले यही लोग उन्हें “सदन में पक्षपात” का आरोपी बना रहे थे। मतलब जो कल विलेन थे, आज वही हीरो हैं — ये बॉलीवुड में भी इतनी तेजी से नहीं होता।

किसानों की बात करने वाले धनखड़, अब विपक्ष की नई उम्मीद?

अब कहा जा रहा है कि धनखड़ किसानों के पक्षधर थे, न्यायपालिका के लिए जवाबदेही चाहते थे। तो भैया, जब यही सब कर रहे थे, तब तो आप उन्हें हटाना चाहते थे!

अचानक से हुई “सहानुभूति की बारिश” — क्या मानसून से पहले ही आ गया तूफान?

सत्तापक्ष के मंत्री बैठक में नहीं आए, विपक्ष को बैठक में बैठने का मौका नहीं मिला — और धनखड़ ने इस्तीफा दे दिया। और विपक्ष ने… राजनीति शुरू कर दी।

राजनीति में याददाश्त नहीं होती, बस अवसर होते हैं

आज का दिन यह साबित करता है कि भारतीय राजनीति में स्थायी दोस्त-दुश्मन नहीं होते, सिर्फ मौके होते हैं। धनखड़ साहब इस्तीफा देकर चले गए, पर पीछे राजनीति का नया सीज़न शुरू कर गए।

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