1966 की फिल्म दिल दिया दर्द लिया दिलीप कुमार का वो इमोशनल प्रोजेक्ट था, जिसमें उन्होंने ना सिर्फ एक्टिंग की बल्कि डायरेक्शन में भी हाथ डाला। सोचा था “हीथक्लिफ़” बन कर इतिहास रचेंगे, लेकिन बॉक्स ऑफिस पर इतिहास ही ग़ायब हो गया। रेट्रो रिव्यू: “वो कौन थी?” – और आज तक किसी को नहीं पता फिल्म का नारा होना चाहिए था –“दिल दिया, दर्द लिया… पर टिकट के पैसे वापस नहीं मिले।” वुथरिंग हाइट्स इन देसी टाइप एमिली ब्रोंटे के डार्क, इंटेंस और पागलपन से भरे उपन्यास Wuthering Heights को…
Read MoreCategory: मनोरंजन
अहान पांडे की सैयारा से एंट्री, ट्विटर पर मचा बवाल – आशिकी 2 की यादें ताजा
18 जुलाई 2025 को रिलीज़ हुई यशराज फिल्म्स की ‘सैयारा’, केवल एक फिल्म नहीं, बल्कि बॉलीवुड में अहान पांडे की बकायदा एंट्री का ऐलान है। मोहित सूरी के निर्देशन में बनी यह फिल्म उतनी ही भावुक है, जितनी आक्रामक, और उतनी ही साउंडट्रैक-हैवी है, जितनी “आशिकी-मैगनेटिक”। “अब मोहब्बत एकतरफा ना होई! ओवैसी बोले – हमरो दिल टुटेला, गठबंधन वाला!” फिल्म में क्या है खास? कृष कपूर का गुस्सा और गिटार दोनों बजता है! फिल्म का मुख्य किरदार कृष कपूर (अहान पांडे) गिटार भी बजाता है और आलोचकों की धुलाई भी…
Read Moreफिल्ममेकर-एक्टर धीरज कुमार का निधन, 80 साल की उम्र में ली अंतिम सांस
भारतीय एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के जाने-माने निर्माता, निर्देशक और अभिनेता धीरज कुमार अब हमारे बीच नहीं रहे। 80 वर्षीय धीरज कुमार का मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल में निधन हो गया।वो कुछ दिनों से निमोनिया के कारण भर्ती थे और वेंटिलेटर पर थे। संगम रेट्रो रिव्यू: जब प्यार, दोस्ती और विदेश यात्रा तीन घंटे में फिट हो गए अस्पताल में थे भर्ती, अब नहीं रहे उनकी हालत पिछले कुछ दिनों से बेहद नाज़ुक थी। परिवार ने कुछ दिन पहले एक बयान जारी कर फैंस से प्राइवेसी बनाए रखने और उनके स्वास्थ्य लाभ…
Read Moreपड़ोसन फिल्म रेट्रो रिव्यू: जब किशोर कुमार ने म्यूजिक से सबको चुप कर दिया
1968 की “पड़ोसन” कोई साधारण रोमांटिक कॉमेडी नहीं थी, बल्कि यह उन लोगों की पवित्र गाथा है जो प्रेम के लिए कुछ भी करने को तैयार थे—यहां तक कि संगीत भी सीख लिया! जी हां, भोलाराम (सुनील दत्त) एक ऐसा प्रेमवीर है जिसे न संगीत आता है, न तमीज़, लेकिन मोहब्बत के नाम पर वो सब सीख जाता है — थिरकना छोड़, थिरकाने का गुर भी! चेहरा चिपचिपा या चमकदार? सावन में स्किन केयर के देसी जुगाड़ जब किशोर कुमार बने गायक और गाइड किशोर कुमार उर्फ “विद्यापति” यानी वो…
Read Moreरेट्रो रिव्यू: “वो कौन थी?” – और आज तक किसी को नहीं पता
राज खोसला निर्देशित ‘वो कौन थी’ (1964) एक ऐसी रहस्यमयी थ्रिलर है, जो शुरू होते ही सवाल छोड़ देती है – “कौन थी वो सफेद साड़ी वाली लड़की जो रात की बारिश में टैक्सी रुकवाती है?” और दर्शक 2 घंटे 25 मिनट तक यही सोचता रह जाता है – “अरे भाई, कोई तो बताए!” ‘एक फूल दो माली’ रिव्यू: बलराज साहनी और संजय खान की क्लासिक प्लॉट का मजा: जहां प्यार भी है… और प्रेत भी? फिल्म की शुरुआत होती है एक अजनबी लड़की से जो बारिश में डॉक्टर आनंद…
Read Moreसंगम रेट्रो रिव्यू: जब प्यार, दोस्ती और विदेश यात्रा तीन घंटे में फिट हो गए
राज कपूर की ‘संगम’ (1964) एक ऐसी फिल्म है जिसमें दोस्ती इतनी पवित्र थी कि अगर WhatsApp होता, तो शायद रणवीर (राज कपूर) का “Seen” भी एक इमोशनल सीन बन जाता।फिल्म में ट्रायंगल लव स्टोरी है, लेकिन प्लॉट इतना फैला हुआ कि आपको लगता है – “ये फिल्म नहीं, इमोशंस की रेलवे लाइन है, जिसमें हर स्टेशन पर आंसू हैं।” IND vs ENG : केएल राहुल के आउट होते ही लड़खड़ाया इंडिया लव लेटर, जो आज भी इंटरनेट स्पीड से तेज़ पहुंचता है! राजेंद्र कुमार का किरदार जब प्यार छुपाता…
Read Moreरेट्रो रिव्यू: दोस्ती (1964) – जब दोस्ती में रोना गारंटी था
1964 की फिल्म दोस्ती कोई फिल्म नहीं, एक एंटीक इमोशनल तोप थी, जो हर दर्शक की आंखों पर डायरेक्ट हमला करती थी। इस फिल्म को देखकर ऐसा लगता था जैसे डायरेक्टर ने कह दिया हो, “भाई, जो नहीं रोया, उसे टिकट फ्री!” प्लॉट या इमोशनल जाल? कहानी दो दोस्तों की है – एक अंधा, दूसरा लंगड़ा। सुनने में लगेगा कि ये कोई अस्पताल की दोस्ती है, पर नहीं – ये उस जमाने की स्क्रिप्ट है जब इमोशन का मीटर ऑटोमैटिक हायपर पर था। हर सीन में या तो किसी का…
Read More‘एक फूल दो माली’ रिव्यू: बलराज साहनी और संजय खान की क्लासिक
1969 में रिलीज़ हुई ‘एक फूल दो माली’ एक ऐसी भावनात्मक फिल्म है जो अब भी दर्शकों के दिलों में जिंदा है। राज खोसला के निर्देशन में बनी इस फिल्म में प्यार, त्याग, मातृत्व और पितृत्व के भावों को बेहद मार्मिक तरीके से पेश किया गया है। मुख्य कलाकारों की अदाकारी बलराज साहनी ने एक संघर्षशील पिता के रूप में दिल को छू लेने वाला परफॉर्मेंस दिया। संजय खान, एक फौजी प्रेमी के रूप में प्रभावशाली लगे, जो हालात से हार नहीं मानता। साधना ने अपने शांत लेकिन दृढ़ किरदार…
Read Moreरेट्रो रिव्यू: नदिया के पार – प्रेम, परंपरा और पंखे की पुरानी हवा
1982 में आई फ़िल्म “नदिया के पार” किसी फिल्म से कम और गांव के चबूतरे पर बैठी दादी की कहानी से ज्यादा लगती है।ये फ़िल्म थी उस दौर की जब प्यार आंखों से होता था, मैसेज से नहीं। और शादी तय होती थी तुलसी के पौधे के पास, Tinder पर नहीं। जलेबी, वड़ा पाव और समोसे पर चेतावनी! अगला क्या? चाय पर हेल्थ टैक्स? हीरो: सीधे खेत से निकला देसी क्रश सचिन (चंदन) का किरदार ऐसा जैसे खेत में पैदा हुआ, कसम से ‘ग्लिसरीन’ के बिना भी आंखें नम कर…
Read Moreरेट्रो रिव्यू: शोले – जब सिनेमा गोली से नहीं, डायलॉग से चलता था
1975 की इस महागाथा को ‘फिल्म’ कहना सूरज को दिया दिखाने जैसा है। ‘शोले’ कोई मूवी नहीं, बल्कि हमारे घरों की दीवारों पर टंगी हुई याद है। जय-वीरू की दोस्ती, ठाकुर की चुप्पी, और गब्बर का खौफ – सब कुछ इतना ज़िंदा है कि लगता है गब्बर अभी भी पूछ रहा है – “कितने आदमी थे?” तेजस्वी के बैठक में कांग्रेस बोली – ‘हमार टिकिया हमके ही चाही जय-वीरू ही असली ब्रोमांस थे बिना जैकेट पहने, बिना बाइक हेलमेट लगाए, रामगढ़ की गलियों में बाइक दौड़ाते जय और वीरू बॉलीवुड…
Read More