जब जब फूल खिले (1965): कश्मीर की वादियों में जन्मी एक अमर प्रेम कहानी

1965, जब भारत में श्वेत-श्याम से रंगीन फिल्मों की ओर संक्रमण हो रहा था, उसी समय एक फिल्म आई जिसने हमें सिखाया कि प्यार न तो क्लास देखता है, न कल्चर… बस ट्रेन पकड़ लेता है। ‘जब जब फूल खिले’ सिर्फ एक प्रेम कहानी नहीं, बल्कि कश्मीर टूरिज़्म बोर्ड का अनौपचारिक प्रमोशनल वीडियो भी थी – जिसमें हाउसबोट से ज्यादा भावनाएं लहराती थीं। गरीब नाविक, अमीर लड़की और वो वादा: “अगले साल फिर आउंगी राजा जी!” राजा (शशि कपूर) एक सॉफ्ट स्पोकन नाविक हैं, जिनकी कश्ती पेड़ से ज़्यादा फिक्स्ड…

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साहिब बीबी और ग़ुलाम रिव्यू: मीना की त्रासदी और गुरु दत्त का अमर क्लासिक

“एक वक़्त था जब शराब के जाम में मोहब्बत डूबती थी… और इज्ज़त को बचाने के लिए तवायफ़ी चालें अपनाई जाती थीं।” ‘साहिब बीबी और ग़ुलाम’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय सिनेमा का तहज़ीबी वसीयतनामा है। अबरार अलवी के निर्देशन में, गुरु दत्त की छाया, मीना कुमारी की पीड़ा और बंगाल की लुप्त होती ज़मींदारी संस्कृति का ऐसा सम्मिलन हुआ, जो आज भी एक अद्वितीय मिसाल है। यह फ़िल्म किसी आलीशान हवेली में बज रहे तबले की आवाज़ नहीं, बल्कि उसके खंडहरों में गूंजती तन्हाई की चीख है। मीना…

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Bam Bam Bhole ने मचाया सोशल मीडिया पर भक्ति धमाल – जय भोलेनाथ

Aelia Entertainments की प्रस्तुति Bam Bam Bhole महाशिवरात्रि  पर रिलीज हुआ था। लेकिन पिछले दो दिन से ये एक बार फिर वायरल हो गया है। Joy Chakraborty की आवाज़ में गाया गया यह भजन श्रोताओं के मन में शांति, श्रद्धा और शिव भक्ति की लहरें जगा रहा है। गाने की एक झलक और आप ‘हर हर महादेव’ के जयघोष में खो जाएंगे। गाने की टीम – जब भक्ति और टैलेंट मिलते हैं Singer: Joy Chakraborty Lyrics: Khushbu Mayank Music & Composition: Joy Chakraborty Mix & Master: Mizraff Music Solution (By…

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रेट्रो रिव्यू गीत गाया पत्थरों ने: जब पत्थरों को भी मोहब्बत का सुर मिल गया…

1964 की ‘गीत गाया पत्थरों ने’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि भारतीय क्लासिक सिनेमा का वो माइलस्टोन है जिसमें पत्थरों में छिपे प्रेम, कला और संघर्ष को एक प्रेम कहानी के ज़रिए जिया गया। वी. शांताराम की कलात्मक दृष्टि और रामलाल के मधुर संगीत ने इस फिल्म को “डायनामाइट विथ लवली रिदम” बना दिया। कहानी: मूर्तिकार बना प्रेमी, प्रेमिका बनी प्रेरणा विजय (जीतेन्द्र) एक युवा टूर गाइड और मूर्तिकार है जिसे विद्या (राजश्री) नाम की एक शास्त्रीय नृत्यांगना से प्यार हो जाता है। लेकिन कहानी में मोड़ तब आता है…

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अछूत कन्या (1936) रेट्रो रिव्यू: जब देविका रानी बवाल की रानी

1936 में बनी फ़िल्म ‘अछूत कन्या’ आज भले ही ब्लैक एंड व्हाइट हो, लेकिन उस दौर में इसने जातिवाद की सोच को रंग-बिरंगे बहसों में झोंक दिया था।बॉम्बे टॉकीज़ का यह मास्टरपीस, जिसे फ्रांज़ ओस्टेन ने डायरेक्ट किया और देविका रानी–अशोक कुमार ने अमर बना दिया, सिर्फ़ एक प्रेम कहानी नहीं थी — यह एक सामाजिक घोषणा थी। कहानी: मोहब्बत बनाम मनुवाद प्रताप (अशोक कुमार) एक ब्राह्मण लड़का और कस्तूरी (देविका रानी) एक ‘अछूत’ लड़की — बचपन की दोस्ती कब प्यार में बदल गई, समाज को यह तो मंज़ूर नहीं…

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रेट्रो रिव्यू गाइड: देव और वहीदा ने प्यार, मोक्ष और समाज से दो-दो हाथ किए

अगर आपने “आज फिर जीने की तमन्ना है” कभी गुनगुनाया है, तो इस फ़िल्म के बारे में जानना आपके जीवन के लिए उतना ही ज़रूरी है जितना इंस्टाग्राम पर “वहाँ कौन है तेरा” वाला ट्रेंड। देव आनंद और वहीदा रहमान अभिनीत गाइड (1965) कोई साधारण प्रेम कहानी नहीं, ये आत्मा की खोज, समाज की धूल झाड़ने, और इंसान की अधूरी इच्छाओं का महाकाव्य है। उपन्यास से स्क्रीन तक – आर.के. नारायण की आत्मा और विजय आनंद का कैमरा फ़िल्म आर के नारायण के उपन्यास “द गाइड” पर आधारित है, लेकिन…

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“किंग खान को मिला ‘नेशनल क्राउन’, एक्टिंग अब सिर्फ़ काम नहीं ‘कर्तव्य’ है!”

शुक्रवार को शाहरुख़ ख़ान ने एक्स (Twitter) पर एक वीडियो साझा किया, जिसमें उन्होंने अपने अंदाज़ में 71वें राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार के लिए भारत सरकार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय और ज्यूरी को धन्यवाद दिया। “यह सिर्फ़ एक अवॉर्ड नहीं… एक रिमाइंडर है कि मेरी कला का समाज में मतलब है।” उन्होंने यह भी जोड़ा कि एक्टिंग अब केवल प्रोफेशन नहीं, एक सामाजिक ज़िम्मेदारी बन चुकी है। ‘जवान’ ने दिल भी जीता, नेशनल अवॉर्ड भी ‘जवान’ में SRK के दमदार डबल रोल और सामाजिक सन्देश ने बॉक्स ऑफिस से लेकर सरकारी…

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नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स: शाहरुख बने ‘जवान’, रानी बनीं ‘बेस्ट’, ‘कटहल’ बनीं हिंदी की सरताज

हर साल की तरह इस बार भी नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स का मंच चमका – कुछ उम्मीदों ने उड़ान भरी तो कुछ फैसलों पर जनता की भौंहें तनी। पर एक बात तो साफ़ है – इस साल के अवॉर्ड्स में ‘विविधता’ का डंका बजा। बेस्ट हिंदी फिल्म – ‘कटहल’: फल नहीं, फिल्म है जनाब! नेटफ्लिक्स पर आई ‘कटहल: द जैकफ्रूट मिस्ट्री’ ने अपनी अनोखी स्क्रिप्ट और सामाजिक तंजों की बदौलत इस साल का बेस्ट हिंदी फिल्म अवॉर्ड जीत लिया। कटहल, जो पहले मज़ाक समझी गई थी, अब खुद एक सम्मानित नाम…

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सन ऑफ सरदार 2 रिव्यू: बिना दिमाग की कॉमेडी में अजय फीके

बॉलीवुड में सीक्वल का बुखार जारी है और इस दौर के सबसे व्यस्त खिलाड़ी हैं अजय देवगन। ‘सन ऑफ सरदार 2’ उसी कड़ी का हिस्सा है, लेकिन अफसोस… यह हिस्सा बाकी से कमज़ोर है। यह फिल्म 2012 की ‘सन ऑफ सरदार’ का स्टैंडअलोन सीक्वल है, पर कहानी और संवेदना दोनों पिछली फिल्म से नदारद हैं। कहानी में उलझन और ठहाकों की तलाश जस्सी (अजय) को 10 साल बाद वीजा मिलता है और वो लंदन पहुंचता है, मगर पत्नी डिंपल (नीरू बाजवा) अब किसी और की हो चुकी है। यहां से…

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रेट्रो रिव्यू-राज कुमार ने क्लास ली, डैनी ने प्लॉट किया – ये ‘बुलन्दी’ है बॉस!

साल था 1980। जनता टीवी के बजाय सिनेमा हॉल में “क्लास” लेती थी और रंजीत सिंह लोबो जैसे लोग बच्चों को पढ़ाई से ज़्यादा साज़िशें सिखाते थे। निर्देशक इस्माईल श्रॉफ की ‘बुलन्दी’ ऐसी ही क्लासिक कहानी है जिसमें राज कुमार का संवाद और डैनी का ड्यूल रोल — दोनों ही ‘सिलेबस’ से बाहर हैं। प्लॉट: गुरु और गुंडों का गहन गठबंधन प्रोफेसर सतीश खुराना (राज कुमार) एक आदर्शवादी शिक्षक हैं जिन्हें पढ़ाना है मनजीत सिंह लोबो (डैनी डेन्जोंगपा) को, जो इतने बिगड़े हुए हैं कि Netflix भी उसे कास्ट करने…

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