
उत्तर प्रदेश में एक दिल दहला देने वाली घटना सामने आई है। पुलकित अवस्थी—जो खुद बीजेपी के समर्पित कार्यकर्ता थे—कैंसर पीड़ित पिता के इलाज के लिए महीनों से जूझ रहे थे। घर में पैसे नहीं बचे थे। डॉक्टरों ने साफ कहा—“इलाज जारी रखना है तो तुरंत रकम चाहिए।”
और फिर ऐसा हुआ कि जिसे सरकारी मदद का रास्ता कहा जाता है, वही रास्ता उनके लिए बंद गली साबित हो गया।
बीजेपी MLC संतोष सिंह ने चिट्ठी लिखी… लेकिन सिस्टम सो गया
बीजेपी एमएलसी संतोष सिंह ने खुद मामला सुना- सत्यापित किया- और मुख्यमंत्री विवेकाधीन कोष से आर्थिक सहायता के लिए औपचारिक चिट्ठी जारी की।
चिट्ठी आगे बढ़ी… लेकिन वहीं अटक गई। फाइलें चलीं… लेकिन इतनी धीमी कि इलाज रुक गया। और यही रुकावट, एक आदमी की ज़िंदगी भी रोक गई।
सरकारी तंत्र की देरी या सिस्टम की हत्या?
इस देश में एक कड़वा सच है— लोग सरकारी मदद तभी मांगते हैं, जब उनके पास कोई और विकल्प बचता ही नहीं।
लेकिन यहाँ…• चिट्ठी थी • अधिकार था • सिफारिश थी • दस्तावेज़ थे और फिर भी— मदद नहीं आई, इलाज नहीं चला, और एक इंसान नहीं बच पाया।
क्या ये सिर्फ एक मौत है? या सिस्टम द्वारा की गई हत्या?
पुत्र की पीड़ा: “सिस्टम चलता रहा, पापा चले गए”
पुलकित अवस्थी ने हर दरवाज़ा खटखटाया। हर फोन किया। हर अधिकारी को याद दिलाया। लेकिन सिस्टम वही पुराना था—“फाइल चल रही है… प्रक्रिया में है… कल बतायेंगे…”

और इसी कल में एक पिता की जिंदगी खप गई।
यही वो कहानी है जिसे पढ़कर हम सबको शर्म आनी चाहिए
क्योंकि यह सिर्फ अवस्थी परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि उस बड़ी बीमारी का लक्षण है— जहाँ सरकारी मदद कागज़ पर आती है, लेकिन ज़मीन तक नहीं।
सिस्टम से सीधा सवाल
क्या मदद के लिए संवेदना चाहिए या “सही कनेक्शन”?
जब एक ruling-party worker की चिट्ठी लटक जाए, तो आम आदमी की फाइल का क्या हाल होगा?
कितनी मौतें और चाहिएं ताकि तंत्र जागे?
फिनाले से पहले ही Winner घोषित? जल्दबाज़ी ने BB19 फैंस का BP बढ़ाया!

