
भाजपा के अंदरूनी गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यही है — “योगी जी का युग चलेगा, या दिल्ली के दरबार का दांव चलेगा?”
पिछले कुछ वर्षों में योगी आदित्यनाथ की ठाकुर ब्रांड राजनीति ने जिस तरह प्रदेश पर पकड़ बनाई है, उससे बाकी जातीय गुट — खासकर ब्राह्मण — धीरे-धीरे साइडलाइन महसूस करने लगे।
अब यही वर्ग प्रदेश अध्यक्ष पद के जरिए अपनी वापसी चाहता है। और बीजेपी आलाकमान भी जानती है कि 2027 जीतनी है तो खिचड़ी सबके लिए होनी चाहिए, सिर्फ एक जाति के लिए नहीं।
संगठन बनाम सरकार: सियासी स्वाद का दूसरा तड़का
भाजपा में एक और अंदरूनी तकरार — “संगठन बनाम सरकार” की भी चल रही है।
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संगठन चाहता है कि एक सॉफ्ट, संयमी ब्राह्मण चेहरा आए जो मोदी-शाह की लाइन पर चले।
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सरकार यानी योगी कैंप चाहता है कि प्रदेश अध्यक्ष ऐसा हो जो मुख्यमंत्री की हां में हां मिलाए, ना कि दिल्ली की हर बात पर सिर हिलाए।
यही वजह है कि हरीश द्विवेदी जैसे नाम चर्चा में हैं — क्योंकि वो योगी जी के करीबी हैं और ब्राह्मण भी।
मनोज तिवारी का नमक — स्वाद बढ़ाएगा या खिचड़ी बिगाड़ेगा?
मनोज तिवारी का नाम भी अंदरूनी हलचल में एक “तुरुप का तड़का” है। वो ब्राह्मण भी हैं, पॉपुलर भी हैं, और जनता से जुड़े चेहरे माने जाते हैं। मगर… र्टी क्या उन्हें यूपी की वैतरणी पार कराने के लिए भेजेगी?
क्या योगी कैंप उन्हें स्वीकार करेगा?
ये सवाल हवा में तैर रहे हैं जैसे भाप से उठती खिचड़ी की महक।
बुजुर्ग बनाम युवा: अनुभव बनाम ऊर्जा की रेस
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रमापति राम त्रिपाठी जैसे वरिष्ठ नेताओं को संगठन की परिपक्वता के तौर पर देखा जाता है।
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जबकि हरीश द्विवेदी जैसे युवा नेताओं को 2027 की सोशल मीडिया फ्रेंडली राजनीति के लिए तैयार किया जा रहा है।
दिल्ली को चाहिए चतुर राजनेता, योगी को चाहिए विश्वसनीय सेनापति, और ब्राह्मणों को चाहिए इज्ज़त + हिस्सेदारी।
खिचड़ी कब और कैसे चढ़ेगी चूल्हे पर?
संभावना यही है कि अगस्त के पहले हफ्ते तक भाजपा अपना प्रदेश अध्यक्ष घोषित कर दे। और अगर चेहरा ब्राह्मण हुआ, तो समझिए 2027 की रेस में पहला दांव खेल दिया जाएगा।
भाजपा की खिचड़ी में हर कोई नमक डालना चाहता है
लेकिन सवाल यह नहीं कि कौन नमक डालेगा — सवाल ये है कि कहीं खिचड़ी जले तो नहीं जाएगी?
2027 दूर है, लेकिन भाजपा के सियासी रसोइये अभी से कढ़ाही में लकड़ी झोंक रहे हैं।
जनता देख रही है, कौन कितना पकाया गया है और कौन कच्चा है।

