
दिल्ली की हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया दरगाह में बसंत पंचमी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि 700 साल पुरानी एक ज़िंदा परंपरा है। यह परंपरा न कैलेंडर देखती है, न धर्म की दीवारें—यह बसंत, संगीत और इंसानी जुड़ाव की कहानी कहती है।
Amir Khusrau से शुरू हुई परंपरा
इतिहास बताता है कि जब सूफी संत निज़ामुद्दीन औलिया अपने प्रिय शिष्य के वियोग में उदास थे, तब अमीर खुसरो ने बसंत पंचमी के दिन पीले कपड़े पहनकर, सरसों के फूल लाकर और गीत गाकर अपने गुरु का मन बहलाया।
वहीं से जन्म हुआ—इस अनोखी परंपरा का।
Yellow Isn’t Just a Colour Here
बसंत पंचमी के दिन दरगाह पीले रंग में रंग जाती है।
- सरसों के फूल
- सूफियाना कव्वालियां
- इल्म और ताजगी की दुआएं
यहां बसंत ऋतु नहीं, बल्कि renewal of soul बन जाता है।

Shared Faith, Not Separate Identities
यह जश्न एक साइलेंट जवाब है उन लोगों के लिए जो धर्म को दीवार मानते हैं। दरगाह में बसंत पंचमी यह साबित करती है कि भारत की असली पहचान “shared faith” है, divided labels नहीं।
जहां आज त्योहारों को “मेरा-तेरा” बनाया जा रहा है, वहीं निज़ामुद्दीन की दरगाह हर साल 700 साल पुरानी याद दिलाती है— रंग साझा हों, राग साझा हों, और इंसानियत सबसे ऊपर।
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