मलकपुर मिल की मिठास कड़वी: चीनी निकली, लेकिन किसानों की जेब खाली

चौधरी सवित मलिक
चौधरी सवित मलिक, कृषि एक्सपर्ट

बागपत की मलकपुर चीनी मिल में नया पेराई सत्र शुरू हो चुका है, लेकिन किसानों के लिए यह सत्र उम्मीद नहीं, उधारी का नया चैप्टर लेकर आया है। पिछले साल का 184 करोड़ बकाया अब बढ़कर 200 करोड़ रुपये हो गया है — यानी गन्ना खेत से निकला, मिल में पहुंचा, पर किसान के खाते तक नहीं पहुँचा।

अकाउंट फ्रीज़, किसान की जिंदगी भी!

गन्ना समिति मलकपुर के चेयरमैन अंकित वीर के अनुसार, मिल के खाते फ्रीज़ हैं और कोई भुगतान नहीं किया गया। किसानों ने डीएम, गन्ना अधिकारी, मंत्री सबको याद दिलाया, लेकिन जवाब सिर्फ एक — “कार्यवाही पर विचार हो रहा है।”
किसान बोले – “विचार करते रहिए साहब, तब तक हमारा गन्ना सूख जाएगा!”

किसान की मजबूरी – गन्ना कटे या घर खर्च!

नवंबर का महीना, शादी-ब्याह, बच्चों की फीस, पशुओं का चारा, किस्तें… सब किसान की टेंशन लिस्ट में हैं। महेंद्र, सतेंद्र, कृष्णपाल और जयसिंह बताते हैं — “हमने धरना भी दिया, मीडिया में आवाज भी उठाई, पर सरकार और मिल दोनों को परवाह नहीं।”
एक किसान ने कटाक्ष किया — “गन्ना हमारा, मेहनत हमारी, पर फायदा मिल का — और चुप्पी सरकार की!”

दूसरी मिलों पर कार्रवाई, मलकपुर पर क्यों नहीं?

किसानों ने सवाल उठाया — जब 103 करोड़ बकाया वाली मिल पर पेराई रोकी जा सकती है, तो 200 करोड़ बकायेदार मलकपुर मिल पर ऐसी मेहरबानी क्यों?
अगर मिल भुगतान नहीं कर सकती, तो अधिग्रहण या सीलिंग की कार्रवाई क्यों नहीं होती?

गांव में भूख, ब्याज और बेबसी का मिलाजुला दर्द

किसानों ने बताया कि कई परिवारों ने शादियां टाल दीं, कुछ के घरों में चूल्हे ठंडे हैं, और कई किसान साहूकारों के कर्ज में डूब रहे हैं
विपिन तोमर बोले – “हमारी मेहनत को मजाक बना दिया गया है। अगर अब भी कार्रवाई नहीं हुई, तो सड़क पर उतरना ही आखिरी रास्ता है।”

सवाल साफ है — सरकार सो रही है या मिल की ढाल बनी है?

मलकपुर मिल का रवैया सिर्फ भुगतान में देरी नहीं, बल्कि किसानों की मेहनत और सम्मान का अपमान है।
यदि प्रशासन अब भी खामोश रहा, तो यह किसानों के विश्वास और पूरे कृषि तंत्र को कमजोर कर देगा।

किसान अब पूछ रहे हैं —
 “गन्ना खेत में ज्यादा दिन नहीं टिकता, पर सरकार कब तक सोएगी?”
 “क्या मिल का शुगर मीटर ही सरकार का न्याय मापता है?”

मलकपुर मिल में इस वक्त सिर्फ दो चीजें चल रही हैं — चीनी का पेराई और किसानों की ठगी! अब देखना ये है कि सरकार ‘मीठे वादों’ से आगे बढ़कर असली चीनी जैसी कार्रवाई करती है या नहीं।

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