आखिरी जुमा, आखिरी सजदा… दिल में दुआ—या अल्लाह, मुल्क सलामत रख

शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

रमजान का आखिरी जुमा… वो लम्हा जब आंखें नम होती हैं और दिल दुआओं से भर जाता है। आज लखनऊ, दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद तक एक ही तस्वीर दिखी—सफेद कपड़े, झुके सिर, और एक ही आवाज… “आमीन।”

ये सिर्फ नमाज़ नहीं थी, ये मुल्क की रूह का इम्तिहान था—जहां हर हाथ उठा, लेकिन किसी के खिलाफ नहीं… सबके लिए उठा।

सुरक्षा का घेरा… लेकिन सुकून का माहौल

लखनऊ, दिल्ली, मुंबई और हैदराबाद सभी जगह प्रशासन अलर्ट था। पुलिस हर मोड़ पर तैनात थी। लेकिन दिलचस्प बात ये रही जहां बंदूकें खड़ी थीं, वहां भी दुआएं चल रही थीं। सख्ती थी, लेकिन डर नहीं था। क्योंकि माहौल में तनाव नहीं, तहजीब थी।

दुआएं सिर्फ अपने लिए नहीं थीं

नमाज़ के बाद जो हाथ उठे, उनमें सिर्फ अपनी खुशियों की मांग नहीं थी। मुल्क की तरक्की, भाईचारा, अमन… और दुनिया के हर दर्द के लिए दुआ मांगी गई। यहां तक कि मिडिल ईस्ट में मारे गए मासूमों के लिए भी लोगों ने रोकर दुआ की।

बदर हाशमी का एक वाक्य पूरे दिन की सबसे बड़ी हेडलाइन बन गया “अगर पड़ोसी भूखा है, तो आपकी ईद अधूरी है।”

अब ईद की रफ्तार… बाजारों में उफान

जैसे ही अलविदा जुमा खत्म हुआ, पूरा माहौल बदल गया। मस्जिद से निकलते ही लोग बाजार की तरफ बढ़े। कपड़ों की दुकानों पर भीड़, इत्र की खुशबू, सेवइयों की मिठास हर तरफ ईद का ट्रेलर चल रहा है, फिल्म कल रिलीज होगी।

पूरे देश में एक ही तस्वीर

भारत के हर कोने में आज एक जैसी तस्वीर थी। चाहे कोलकाता की मस्जिद हो या चेन्नई का नमाज़ी मैदान हर जगह सिर्फ एक मैसेज था
“हम साथ हैं… और रहेंगे।”

रमजान गया… लेकिन उसका सबक बाकी है

अलविदा जुमा सिर्फ एक दिन नहीं, एक याद दिलाता है— कि जिंदगी सिर्फ अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए भी जीनी है। आज सजदे खत्म हुए, लेकिन जिम्मेदारी शुरू हुई है। ईद कल है… लेकिन इंसानियत हर दिन होनी चाहिए।

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