
114 नए शव निकाले गए, जिनमें कई महिलाएं और बच्चे थे। हमास-संचालित सिविल डिफेंस एजेंसी ने इस आंकड़े की पुष्टि की है। लेकिन ये सिर्फ आंकड़े नहीं—ये वो चेहरे हैं जो किसी की मां थीं, किसी का बचपन थे और किसी की आखिरी उम्मीद।
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ग़ज़ा में न राहत पहुंच रही, न पत्रकार
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इज़राइल ने ग़ज़ा में राहत सामग्री की एंट्री पूरी तरह बंद कर दी है।
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पत्रकारों का प्रवेश भी रोक दिया गया है।
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सूचनाएं अब सिर्फ धुएं, लाशों और चुप्पियों में लिपटी मिल रही हैं।
“बच्चे भूख से रोते हैं, मां खाली बर्तनों से”
“बच्चे भूख से रोते हैं, और मां इसलिए रोती हैं कि उनके पास उन्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है।“
लेकिन इन कराहों के जवाब में इज़राइल कहता है—”ग़ज़ा में खाने की कोई कमी नहीं है।” यह बयान उस समय आया जब संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियां गंभीर मानवीय संकट की चेतावनी दे रही हैं।
7 अक्टूबर से अब तक मौत का आँकड़ा: 52,829
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ग़ज़ा स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, 7 अक्टूबर 2023 से अब तक 52,829 लोग मारे गए हैं।
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ये वो समय था जब इज़राइल-हमास युद्ध शुरू हुआ था।

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युद्धविराम टूटने के बाद हमलों की रफ्तार और निर्दयता दोनों बढ़ी हैं।
अंतरराष्ट्रीय चुप्पी: मानवता किसके दरवाज़े जाएगी?
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संयुक्त राष्ट्र, रेड क्रॉस और तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं सिर्फ अपीलें कर रही हैं।
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लेकिन ज़मीनी सच्चाई यही है कि ग़ज़ा एक खुली जेल बन चुका है।
“जिस जगह पर ना भोजन हो, ना पानी, ना दवा, और ऊपर से बम गिरें—उसे युद्ध नहीं नरसंहार कहा जाता है।”
ग़ज़ा अब सिर्फ एक भू-भाग नहीं, एक सामूहिक कब्रगाह बन रहा है।
जहां हर दिन किसी बच्चे का भविष्य, किसी मां की कोख और किसी बाप की उम्मीद मलबे में दबी मिलती है।
सवाल सिर्फ यह नहीं कि युद्ध कब रुकेगा, सवाल यह है कि इंसानियत इतनी देर तक क्यों सोई रहेगी?
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