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उन्नाव। मुरादाबाद नगर में 66वें भव्य राम लीला महोत्सव का शुभारंभ गणेश पूजन के साथ हुआ। इसके पश्चात लीला मण्डल द्वारा नारद मोह की सुन्दर लीला का मंचन किया गया।
देवर्षि नारद हिमालय की कंदराओं में बैठकर गहरी तपस्या करते हैं। उनकी तपस्या को देखकर देवराज इंद्र घबरा जाते हैं और उनकी तपस्या भंग करने के लिए कामदेव को भेजते हैं, लेकिन कामदेव नारद जी पर अपना प्रभाव नहीं डाल पाते। कामदेव पर विजय प्राप्त करने के बाद नारद जी को घमंड हो जाता है कि उन्होंने कामदेव को हरा दिया है। वे यह बात पहले शिवजी और फिर भगवान विष्णु को बताते हैं।
नारद जी का अभिमान तोड़ने के लिए भगवान विष्णु अपनी माया से एक अत्यंत सुंदर नगर और राजा शीलनिधि की पुत्री विश्वमोहिनी का स्वयंवर रचते हैं। नारद मुनि विश्वमोहिनी को देखकर उस पर मोहित हो जाते हैं और स्वयंवर में उससे विवाह करने की इच्छा रखते हैं। वे भगवान विष्णु के पास जाकर उनसे ‘हरि रूप’ (सुंदर रूप) मांगते हैं ताकि विश्वमोहिनी उनके गले में वरमाला डाले। भगवान विष्णु उन्हें हरि रूप तो देते हैं, लेकिन नारद जी को बंदर (वानर) का चेहरा मिल जाता है।
स्वयंवर में विश्वमोहिनी नारद जी को छोड़कर सीधे भगवान विष्णु के गले में वरमाला डाल देती है। जब नारद जी शीशे में अपना चेहरा देखते हैं, तो उनका अहंकार टूट जाता है और उन्हें अपनी भूल का अहसास होता है। क्रोधित होकर नारद जी भगवान विष्णु को श्राप देते हैं कि “जैसे मुझे स्त्री के वियोग में तड़पना पड़ा है, वैसे ही आपको भी त्रेता युग में मनुष्य योनी में जन्म लेना पड़ेगा और पत्नी (सीता) का वियोग सहना पड़ेगा”।
भगवान विष्णु नारद जी के इस श्राप को सहर्ष स्वीकार करते हैं। इस अवसर पर रामलीला समिति के सभी पदाधिकारियों के साथ ही नगर और क्षेत्र के तमाम लोग उपस्थित रहे।
