‘सर्किट’ से बिल्कुल अलग अवतार में अरशद वारसी, डाकू महाराज बनेंगे खौफ का चेहरा; प्रतीक गांधी से भिड़ेगी सोच और सत्ता की जंग

मुंबई: अरशद वारसी और प्रतीक गांधी जल्द ही दर्शकों को एक ऐसी दुनिया में लेकर जाने वाले हैं, जहां बंदूक से ज्यादा दिमाग, ताकत से ज्यादा रणनीति और अपराध से ज्यादा सत्ता का खेल मायने रखता है। फिल्ममेकर तिग्मांशु धूलिया की फिल्म ‘घमासान’ में अरशद वारसी डाकू महाराज के किरदार में नजर आएंगे, जबकि प्रतीक गांधी एसटीएफ अधिकारी आदित्य की भूमिका निभा रहे हैं। फिल्म की कहानी बुंदेलखंड के बीहड़ों में बसे उस खौफ और व्यवस्था के इर्द-गिर्द घूमती है, जहां महाराज का वर्षों से दबदबा कायम है। फिल्म 11 सितंबर 2026 को जी5 पर सीधे ओटीटी पर रिलीज होगी।

अरशद वारसी के लिए ‘घमासान’ का महाराज वाला किरदार खास इसलिए भी है, क्योंकि यह उनके उन लोकप्रिय किरदारों से पूरी तरह अलग है, जिनमें दर्शकों ने उन्हें अब तक खूब पसंद किया है। ‘मुन्ना भाई’ और ‘सर्किट’ की जोड़ी हिंदी सिनेमा की यादगार जोड़ियों में शामिल है और सर्किट के किरदार ने अरशद को घर-घर में पहचान दिलाई। लेकिन ‘घमासान’ में वह कॉमेडी और दोस्ती वाले अंदाज से दूर एक बेहद खतरनाक, अप्रत्याशित और बेरहम डाकू के रूप में दिखाई देंगे।

डाकू महाराज के सामने खड़ा है सोच-समझकर कदम उठाने वाला पुलिस अधिकारी

फिल्म में प्रतीक गांधी एसटीएफ अधिकारी आदित्य का किरदार निभा रहे हैं। यह पुलिस अधिकारी आम फिल्मों की तरह बड़े-बड़े तेवर दिखाकर या हर समस्या का जवाब गोलियों से देने में यकीन नहीं रखता। आदित्य महाराज तक पहुंचने के लिए धैर्य, रणनीति और दिमाग का इस्तेमाल करता है। यही वजह है कि फिल्म की कहानी सिर्फ डाकू और पुलिस की सीधी टक्कर तक सीमित नहीं रहती, बल्कि दोनों के बीच एक गहरे मानसिक संघर्ष का रूप ले लेती है।

प्रतीक गांधी के मुताबिक, आदित्य एक आईपीएस अधिकारी है और उसका सामना ऐसी परिस्थितियों से है, जहां हर कदम सोच-समझकर उठाना पड़ता है। उनके लिए यह लड़ाई काफी हद तक दिमाग का खेल है। उनका मानना है कि आज के दौर में बहादुरी का मतलब सिर्फ मजबूत शरीर या मांसपेशियां नहीं हैं। असली हिम्मत इंसान की सोच, नजरिए और किसी मुश्किल परिस्थिति को देखने के तरीके में होती है।

‘महाराज’ सिर्फ एक आदमी नहीं, एक पूरी सोच है

फिल्म की सबसे दिलचस्प परतों में से एक वह व्यवस्था है, जिसने महाराज जैसे किरदार को पनपने का मौका दिया। प्रतीक गांधी के अनुसार आदित्य की मुश्किल यह भी है कि वह जिस व्यवस्था से लड़ रहा है, वह खुद उसी व्यवस्था का हिस्सा है। यही संघर्ष उसके किरदार को सामान्य पुलिस अधिकारी से अलग बनाता है।

गांधी बताते हैं कि महाराज को सिर्फ एक व्यक्ति के तौर पर देखना कहानी को छोटा कर देना होगा। उनके मुताबिक महाराज एक सोच है। अगर व्यवस्था एक महाराज को खत्म कर भी दे, तो वही सिस्टम किसी दूसरे व्यक्ति को महाराज बना सकता है। इसी वजह से फिल्म में अपराधी को पकड़ने की कहानी के साथ-साथ उस पूरे तंत्र पर भी सवाल उठता है, जो ऐसे किरदारों को ताकत देता है।

फिल्म की टीम ने मजाकिया अंदाज में इसके अगले हिस्से की संभावना पर भी बात की है। अगर कहानी आगे बढ़ती है तो अगली लड़ाई शायद महाराज से ज्यादा उस व्यवस्था के खिलाफ हो सकती है, जिससे आदित्य खुद जुड़ा हुआ है।

असली लोकेशन ने फिल्म को दिया बीहड़ों का कच्चा और वास्तविक एहसास

तिग्मांशु धूलिया की फिल्मों में हिंदी पट्टी की जमीन से जुड़ी कहानियां और सत्ता के जटिल समीकरण पहले भी प्रमुख रहे हैं। ‘हासिल’, ‘पान सिंह तोमर’, ‘साहब बीवी और गैंगस्टर’ जैसी फिल्मों के बाद ‘घमासान’ भी उसी दुनिया की एक नई कहानी लेकर आती है।

निर्देशक के मुताबिक फिल्म की ज्यादातर चीजें पहले से तय थीं, लेकिन असली जगह पर शूटिंग करने से कलाकारों के प्रदर्शन में उस माहौल की ऊर्जा खुद शामिल हो गई। अरशद वारसी भी मानते हैं कि ग्रामीण भारत का कृत्रिम सेट तैयार करने के बजाय वास्तविक स्थानों पर शूटिंग करने से फिल्म को अलग तरह का कच्चापन और विश्वसनीयता मिली।

उनके मुताबिक जब कलाकार वास्तविक माहौल में मौजूद होता है तो उसे अलग से बहुत कुछ करने की जरूरत नहीं पड़ती। आसपास की जगह, धूल, वातावरण और परिस्थितियां ही अभिनय का बड़ा हिस्सा आसान कर देती हैं। प्रतीक गांधी भी इससे सहमत हैं और कहते हैं कि ऐसे माहौल में कलाकार को बस वहां मौजूद रहकर अपने किरदार को जीना होता है।

बिना गोली चलाए भी डर पैदा करेगा महाराज

अरशद वारसी ने महाराज को ऐसा व्यक्ति बताया है जिसके लिए उसकी कही हुई बातें आम इंसान को डरावनी लग सकती हैं, लेकिन उसके अपने संसार में वही सब बिल्कुल स्वाभाविक है। महाराज की खतरनाक छवि सिर्फ उसकी हिंसा से नहीं बनती, बल्कि उसके सोचने और फैसले लेने के तरीके से भी सामने आती है।

फिल्म के ट्रेलर में महाराज का एक संवाद खास तौर पर ध्यान खींचता है—‘आदमी मौत से नहीं डरता, दर्द से डरता है।’ इसके अलावा उसका रवैया ‘समझौता नहीं, क्योंकि बदला जायज है’ जैसी सोच को सामने लाता है। इन संवादों से साफ है कि महाराज अपनी दुनिया में खुद को गलत नहीं मानता, बल्कि अपने फैसलों को अपने हिसाब से जायज ठहराता है।

खामोशी भी बोलेगी, हर बात संवाद से नहीं होगी साफ

‘घमासान’ की कहानी में खामोशी का भी अहम इस्तेमाल किया गया है। अपराध, डर और सत्ता की कहानी में हर भावना को संवाद के जरिए समझाना जरूरी नहीं होता। कई बार किरदार के चेहरे और उसकी चुप्पी से वह बात सामने आती है, जो शब्दों में कही ही नहीं गई।

अरशद वारसी के लिए ऐसे दृश्य खास महत्व रखते हैं। उनका मानना है कि जब संवाद नहीं होता, तब अभिनेता के पास अपने अभिनय से बहुत कुछ कहने का मौका होता है। वहीं प्रतीक गांधी के मुताबिक दो संवादों के बीच का वह समय बेहद महत्वपूर्ण होता है, जिसमें किरदार के भीतर चल रही उथल-पुथल दिखाई देती है।

उनके अनुसार खामोशी का मतलब भावहीन चेहरा नहीं है। यदि किरदार के भीतर कोई विचार चल रहा है और वह उसे अपने अंदर ही समझने या सुलझाने की कोशिश कर रहा है, तो वह प्रक्रिया चेहरे और व्यवहार में दिखाई देती है। तिग्मांशु धूलिया भी मानते हैं कि बहुत ज्यादा दिखावटी अभिनय रहस्य को खत्म कर देता है। उनके मुताबिक असली किरदार हमेशा कुछ हद तक अप्रत्याशित होता है।

कॉमेडी ने सिखाई गंभीर किरदारों में भी सटीकता

अरशद वारसी और प्रतीक गांधी दोनों की अभिनय यात्रा में हास्य की भी मजबूत भूमिका रही है। ‘घमासान’ का माहौल भले ही गंभीर और तनावपूर्ण है, लेकिन दोनों कलाकार मानते हैं कि कॉमेडी ने उन्हें अभिनय की ऐसी बारीकियां सिखाई हैं, जिनका फायदा गंभीर भूमिकाओं में भी मिलता है।

अरशद वारसी के मुताबिक कॉमेडी कलाकार की झिझक दूर करती है। किसी हास्य भूमिका को निभाते समय अभिनेता को अपनी निजी पहचान और संकोच पीछे छोड़ना पड़ता है। यही प्रक्रिया उसे पर्दे पर ज्यादा खुलकर सामने आने में मदद करती है।

प्रतीक गांधी के लिए कॉमेडी का सबसे बड़ा सबक समय की सटीकता है। उनके मुताबिक हास्य में दो संवादों के बीच का अंतर बेहद महत्वपूर्ण होता है। थोड़ा ज्यादा अंतर हो जाए तो असर खत्म हो सकता है और कम हो जाए तो भी मजाक अपना प्रभाव खो देता है। उनके लिए यह लगभग गणितीय सटीकता जैसा है, जहां 5.2 का मतलब सिर्फ 5.2 है, न कि 5.1 या 5.25।

ट्रेलर में दिखी अपराध, राजनीति और सत्ता की उलझी दुनिया

‘घमासान’ का 1 मिनट 53 सेकेंड का ट्रेलर महाराज और एसटीएफ अधिकारी आदित्य के संघर्ष की झलक देता है। कहानी में बीहड़, अपराध, हिंसा, वफादारी, राजनीति और सत्ता के समीकरण एक-दूसरे से जुड़े नजर आते हैं। महाराज लंबे समय से जंगल की दुनिया में अपना प्रभाव बनाए हुए है और आदित्य को उसे पकड़ने की जिम्मेदारी दी गई है।

फिल्म की खासियत यह है कि यहां कहानी को केवल नायक बनाम खलनायक के ढांचे में नहीं रखा गया है। दोनों पक्षों के पीछे अपनी सोच, मजबूरियां, महत्वाकांक्षाएं और गठजोड़ हैं। यही वजह है कि दर्शक के लिए यह तय करना भी आसान नहीं होगा कि इस कहानी में पूरी तरह सही कौन है और गलत कौन।

‘घमासान’ का निर्देशन तिग्मांशु धूलिया ने किया है। फिल्म का निर्माण जियो स्टूडियोज के लिए ज्योति देशपांडे, गोल्डन रेशियो फिल्म्स के लिए पीयूष सिंह, अभयानंद सिंह, सौरभ गुप्ता और अश्विनी चौधरी तथा येलस्टर फिल्म्स के लिए मितेन शाह ने किया है। फिल्म में अरशद वारसी और प्रतीक गांधी के अलावा इशिता दत्ता और राजपाल यादव भी अहम भूमिकाओं में नजर आएंगे। ‘घमासान’ 11 सितंबर 2026 को जी5 पर रिलीज होगी। इससे पहले फिल्म को मामी, सिनेवेस्ट्योर इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल और शिकागो साउथ एशियन फिल्म फेस्टिवल में प्रदर्शित किया जा चुका है।

 

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