जलियांवाला बाग: उस दिन क्या हुआ था जिसने अंग्रेजों की नींव हिला दी

Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

Jallianwala Bagh Massacre कोई साधारण घटना नहीं थी… यह वो दिन था जब भारत की धरती खून से लाल हो गई। बैसाखी के दिन हजारों लोग अमृतसर के जलियांवाला बाग में इकट्ठा हुए थे, लेकिन किसी को अंदाजा नहीं था कि कुछ ही मिनटों में यह जगह कब्रिस्तान बन जाएगी। यह भीड़ नहीं थी… यह इतिहास का सबसे बड़ा जख्म बनने वाली थी।

रॉलेट एक्ट: अन्याय की शुरुआत

Rowlatt Act ने भारतीयों के अधिकारों को खत्म कर दिया था। बिना सुनवाई के गिरफ्तारी और सजा ने जनता को उबाल पर ला दिया। Mahatma Gandhi ने इसके खिलाफ सत्याग्रह शुरू किया, जिसकी शुरुआत 6 अप्रैल 1919 की हड़ताल से हुई। जब कानून जंजीर बन जाए, तो विरोध ही आजादी बनता है।

गिरफ्तारी ने भड़काया गुस्सा

9 अप्रैल को Saifuddin Kitchlew और Dr. Satyapal को गिरफ्तार कर लिया गया। इससे पंजाब में गुस्से की लहर दौड़ गई और लोग सड़कों पर उतर आए। अंग्रेजों ने हालात संभालने के बजाय मार्शल लॉ लगा दिया। आवाज दबाने की कोशिश ने आग को और भड़का दिया।

जनरल डायर का खूनी आदेश

13 अप्रैल को Jallianwala Bagh में हजारों लोग मौजूद थे। तभी Reginald Dyer अपनी सेना के साथ पहुंचा। उसने बिना चेतावनी दिए बाग का एकमात्र रास्ता बंद कराया और फायरिंग का आदेश दे दिया। करीब 10 मिनट में 1650 राउंड गोलियां चलाई गईं। उस दिन कानून नहीं… क्रूरता शासन कर रही थी।

मौत से बचने के लिए कुएं में कूदे लोग

जब गोलियां चलने लगीं, तो लोग जान बचाने के लिए इधर-उधर भागे, लेकिन ऊंची दीवारों ने उन्हें कैद कर लिया। कई महिलाएं और बच्चे कुएं में कूद गए। वह कुआं, जो कभी पानी देता था… उस दिन लाशों से भर गया। उस दिन जमीन पर जगह नहीं थी… मौत हर तरफ खड़ी थी।

आजादी की लड़ाई का टर्निंग पॉइंट

इस घटना ने पूरे देश को हिला दिया। Rabindranath Tagore ने अपनी नाइटहुड लौटा दी। Mahatma Gandhi ने असहयोग आंदोलन शुरू किया। जलियांवाला बाग ने डर को विद्रोह में बदल दिया।

ऊधम सिंह का बदला

Udham Singh ने इस नरसंहार का बदला लेने की ठान ली। 1940 में उन्होंने लंदन में Michael O’Dwyer की हत्या कर दी। कुछ कहानियां खत्म नहीं होतीं… वो न्याय बनकर लौटती हैं।

एक जख्म जो आज भी जिंदा है

जलियांवाला बाग हत्याकांड ने भारत के स्वतंत्रता संग्राम को नई दिशा दी। यह सिर्फ एक घटना नहीं, बल्कि एक चेतावनी है कि सत्ता का अहंकार कितना खतरनाक हो सकता है। 13 अप्रैल 1919 को सिर्फ खून नहीं बहा था…उस दिन आजादी की नींव रखी गई थी।

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