
अब मरीज लाइन में खड़ा रहेगा या डॉक्टर? बिहार सरकार ने यह सवाल ही खत्म कर दिया है! एक झटके में ऐसा फैसला आया है जिसने सरकारी डॉक्टरों की ‘दो नाव की सवारी’ पर ब्रेक लगा दिया है। अब या तो अस्पताल… या फिर कुछ भी नहीं!
क्या है नीतीश सरकार का बड़ा फैसला?
Nitish Kumar की सरकार ने साफ कर दिया है कि अब सरकारी डॉक्टर निजी प्रैक्टिस नहीं कर पाएंगे। नई नीति के तहत डॉक्टरों को पूरी तरह सरकारी अस्पतालों के लिए समर्पित रहना होगा। यह फैसला राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था को सुधारने के लिए उठाया गया बड़ा कदम माना जा रहा है।
क्यों लगी प्राइवेट प्रैक्टिस पर रोक?
सरकार के पास लगातार शिकायतें आ रही थीं कि डॉक्टर सरकारी ड्यूटी छोड़कर प्राइवेट क्लीनिक में ज्यादा समय दे रहे हैं। नतीजा — अस्पतालों में मरीज परेशान, डॉक्टर गायब!
कई मामलों में गंभीर मरीजों को समय पर इलाज नहीं मिल पाया। इसी ‘डॉक्टर गायब मॉडल’ को खत्म करने के लिए सरकार ने यह सर्जिकल स्ट्राइक कर दी।
डॉक्टरों को कैसे मिलेगा मुआवजा?
अब सवाल ये था कि डॉक्टर मानेंगे कैसे? तो सरकार ने ‘गाजर और डंडा’ दोनों साथ में दिया है। डॉक्टरों को अब Non-Practice Allowance (NPA) और अन्य भत्ते दिए जाएंगे ताकि उनकी आय पर असर न पड़े। यानी क्लीनिक बंद… लेकिन सैलरी का दर्द कम!
किन-किन पर लागू होगा नियम?
यह नियम सिर्फ कुछ डॉक्टरों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम पर लागू होगा। इसमें बिहार स्वास्थ्य सेवा संवर्ग, चिकित्सा शिक्षा सेवा संवर्ग और इंदिरा गांधी हृदय रोग संस्थान के डॉक्टर भी शामिल होंगे।

नियम तोड़ा तो क्या होगा?
सरकार सिर्फ घोषणा करके नहीं रुकी है। जल्द ही ऐसी गाइडलाइन आने वाली है जिसमें साफ होगा कि नियम तोड़ने वालों पर क्या कार्रवाई होगी। संकेत साफ है या तो नियम मानो या फिर नौकरी खतरे में डालो।
क्या बदलेगा अब बिहार का हेल्थ सिस्टम?
अगर यह फैसला जमीन पर सही तरीके से लागू हो गया, तो सरकारी अस्पतालों की तस्वीर पूरी तरह बदल सकती है। मरीजों को समय पर डॉक्टर मिलेंगे, इलाज बेहतर होगा और सिस्टम में भरोसा बढ़ेगा।
अब बिहार में डॉक्टरों को “डबल शिफ्ट” का खेल छोड़ना ही होगा। सरकार ने साफ कर दिया है, या तो जनता की सेवा करो… या फिर सिस्टम तुम्हें बाहर कर देगा।
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