Ribbon कटा, Road फटी! Lucknow Green Corridor बना ‘Green Disaster Corridor’?

राघवेन्द्र मिश्रा
राघवेन्द्र मिश्रा

लखनऊ की चमकती सड़कों के नीचे जैसे कोई चुपचाप साज़िश पल रही थी… ऊपर रिबन कट रहा था, नीचे मिट्टी खिसक रही थी। सिर्फ दो दिन — और “ड्रीम प्रोजेक्ट” ने खुद ही अपना पोस्टमार्टम लिख दिया।
ये कोई साधारण गड्ढा नहीं, ये सिस्टम के आत्मविश्वास में पड़ा वो छेद है, जो हर बारिश में चौड़ा होता जाता है।

उद्घाटन से धंसान तक: 48 घंटे की कहानी

13 मार्च को बड़े मंच, बड़े चेहरे और बड़ी उम्मीदों के बीच ग्रीन कॉरिडोर का उद्घाटन हुआ। लेकिन 48 घंटे भी नहीं बीते कि बीरबल साहनी मार्ग के पास सड़क ने हार मान ली।
हनुमान सेतु से निशातगंज को जोड़ने वाला यह मार्ग अचानक नीचे बैठ गया, जैसे किसी ने नीचे से ज़मीन खींच ली हो।

गनीमत रही कि उस वक्त कोई तेज़ रफ्तार वाहन नहीं था, वरना यह खबर “इंफ्रास्ट्रक्चर फेलियर” से सीधा “ट्रैजेडी” बन जाती।

असली वजह: लीकेज या लापरवाही?

जांच में जो सामने आया, वो नया नहीं था… बस हर बार की तरह अनदेखा था। सीवर पाइपलाइन में लीकेज, मिट्टी का सरकना, निर्माण के दौरान अनदेखी।

स्वेज इंडिया के कर्मचारी ने भी मान लिया कि सीवेज इश्यू पर ध्यान देना चाहिए था। यानी बीमारी पुरानी थी, इलाज सिर्फ रिबन काटकर किया गया।

LDA का ‘क्लासिक बचाव’

एलडीए ने प्रेस रिलीज़ जारी की और कहा — “ये मुख्य कॉरिडोर नहीं, साइड रैम्प है।”

मतलब अगर कार मुख्य सड़क पर फिसले तो जिम्मेदारी, और अगर साइड में गिरे तो “हमारा क्षेत्र नहीं”? ये बयान नहीं, एक प्रशासनिक ‘डिस्क्लेमर गेम’ लगता है।

उधर, दोष जल निगम की पाइपलाइन पर डाल दिया गया। यानी सड़क LDA की, पानी किसी और का, और जिम्मेदारी… हवा में उड़ती हुई।

ग्राउंड रियलिटी: सिस्टम की ‘Patchwork Mentality’

लखनऊ में सड़क बनाना अब इंजीनियरिंग से ज्यादा “इवेंट मैनेजमेंट” हो गया है। पहले उद्घाटन, फिर समस्या, फिर मरम्मत — एक चक्र जो कभी खत्म नहीं होता।

यह घटना सिर्फ एक गड्ढा नहीं, यह बताती है कि प्लानिंग कागज पर होती है। टेस्टिंग किस्मत पर और जिम्मेदारी… प्रेस रिलीज़ में।

जनता का सवाल: “टिकेगा कब?”

लोग पूछ रहे हैं —अगर सड़क 2 दिन में धंस सकती है, तो 2 साल में क्या होगा? Green Corridor अब लोगों के लिए सुविधा कम, एक “सस्पेंस थ्रिलर” ज्यादा बन गया है —कहाँ अगला गड्ढा खुलेगा, कोई नहीं जानता।

लखनऊ का यह मामला सिर्फ एक शहर की खबर नहीं, यह पूरे सिस्टम का एक्स-रे है। जहाँ “लोकार्पण” ही लक्ष्य बन जाए, वहाँ “लंबी उम्र” बोनस बन जाती है।

Related posts

Leave a Comment