
सुबह-सुबह परीक्षा केंद्रों के बाहर भीड़ थी। हाथ में एडमिट कार्ड, आंखों में सरकारी नौकरी का सपना और दिमाग में सिर्फ एक लक्ष्य। उत्तर प्रदेश पुलिस में सब-इंस्पेक्टर बनने का सपना।
लेकिन परीक्षा खत्म होते ही सोशल मीडिया पर एक सवाल वायरल हो गया। और वही सवाल अचानक पूरी भर्ती प्रक्रिया का सबसे बड़ा मुद्दा बन गया।
परीक्षा में पूछा गया था “अवसर के अनुसार बदलने वाला कौन होता है?”
चार विकल्प दिए गए थे। सदाचारी… पंडित… अवसरवादी… निष्कपट।
बस यहीं से विवाद शुरू हुआ। क्योंकि तीन विकल्प व्यक्तित्व के गुण-अवगुण से जुड़े थे, जबकि एक शब्द एक सामाजिक पहचान से जुड़ा माना गया।
सीएम योगी का सख्त संदेश
मामला तेजी से फैलने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री Yogi Adityanath ने इस पर स्पष्ट प्रतिक्रिया दी।
मुख्यमंत्री ने सभी भर्ती बोर्ड के अध्यक्षों को निर्देश दिया कि किसी भी व्यक्ति, जाति, पंथ या संप्रदाय की मर्यादा और आस्था के खिलाफ कोई भी अमर्यादित टिप्पणी या संदर्भ परीक्षा में शामिल नहीं होना चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि पेपर सेटर्स के साथ होने वाले एमओयू में इस नियम को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए।
संदेश साफ था भर्ती प्रक्रिया में ज्ञान की परीक्षा होनी चाहिए, सामाजिक विवाद की नहीं।

5 लाख से ज्यादा अभ्यर्थियों की परीक्षा
इस भर्ती परीक्षा में करीब 5,31,765 अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया। इतनी बड़ी परीक्षा का मतलब है लाखों सपने, हजारों परीक्षा केंद्र और एक बहुत बड़ी प्रशासनिक जिम्मेदारी।
लेकिन इसी दौरान परीक्षा की शुचिता को लेकर भी कुछ मामले सामने आए। लखनऊ में सोशल मीडिया पर फर्जी प्रश्नपत्र फैलाने और ठगी करने के आरोप में सात केस दर्ज किए गए हैं।
STF की कार्रवाई और गिरफ्तारी
मामले की जांच Uttar Pradesh Special Task Force यानी STF कर रही है। जांच के दौरान आगरा से एक आरोपी को गिरफ्तार किया गया है। आरोप है कि वह फर्जी प्रश्नपत्र भेजकर अभ्यर्थियों से पैसे वसूल रहा था।
STF का कहना है कि जांच अभी जारी है और आगे भी कार्रवाई हो सकती है। यानी परीक्षा का विवाद अब सिर्फ एक प्रश्न तक सीमित नहीं रहा। यह पारदर्शिता और सुरक्षा का भी मुद्दा बन गया है।
भर्ती प्रक्रिया पर उठे बड़े सवाल- अब आगे क्या होगा
यह घटना एक बड़े सवाल की तरफ इशारा करती है। क्या प्रतियोगी परीक्षाओं में प्रश्न तैयार करते समय सामाजिक संवेदनशीलता और भाषा की सावधानी को पर्याप्त महत्व दिया जा रहा है?
मेंटर प्रभाष बहादुर मानते हैं कि आज के डिजिटल दौर में एक छोटा सा शब्द भी राष्ट्रीय बहस का कारण बन सकता है। इसलिए भर्ती परीक्षाओं में सिर्फ ज्ञान ही नहीं बल्कि संतुलित सोच भी जरूरी है।
सरकार की तरफ से सख्त निर्देश जारी हो चुके हैं। STF जांच भी जारी है। अब नजर इस बात पर है कि क्या प्रश्नपत्र बनाने वाली एजेंसी इस मामले पर स्पष्टीकरण देगी और भविष्य में ऐसी स्थिति से बचने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे। क्योंकि सरकारी नौकरी की परीक्षा सिर्फ एक परीक्षा नहीं होती। वह लाखों युवाओं के विश्वास का नाम भी होती है। और विश्वास की परीक्षा में एक शब्द भी कभी-कभी पूरे सिस्टम को कटघरे में खड़ा कर देता है।
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