फेक न्यूज़ बनाम फ्री स्पीच: डिजिटल मीडिया कानून पर सुप्रीम बहस

शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

डिजिटल दुनिया में खबरें अब बिजली की रफ्तार से फैलती हैं. लेकिन हर खबर सच नहीं होती. इसी सवाल ने अब अदालत की चौखट पर दस्तक दी है.

सोशल मीडिया पर फैलती फर्जी खबरों को रोकने के लिए बनाए गए नियम पर जब Supreme Court of India में सुनवाई शुरू हुई, तो बहस सिर्फ कानून की नहीं रही. यह बहस बन गई फेक न्यूज़ बनाम अभिव्यक्ति की आज़ादी

अदालत में उठी डिजिटल अराजकता की चिंता

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश Surya Kant ने साफ कहा कि डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर फैल रही फर्जी खबरें समाज के लिए गंभीर खतरा बन चुकी हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे कई उदाहरण सामने आए हैं जहां गलत सूचना से संस्थाओं की साख प्रभावित हुई है।

विवाद की जड़ क्या है

मामला ‘डिजिटल मीडिया नैतिकता कानून संशोधन अधिनियम 2023’ के नियम 3 से जुड़ा है। इस नियम के तहत केंद्र सरकार को Fact Check Unit (FCU) बनाने की शक्ति दी गई थी। यह यूनिट सरकार से जुड़ी “फेक, फॉल्स या मिसलीडिंग” खबरों की पहचान कर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को उसे हटाने का निर्देश दे सकती थी।

जब हाईकोर्ट ने खड़ा किया बड़ा सवाल

इस नियम को चुनौती दी गई और मामला पहुंचा Bombay High Court के पास। सितंबर 2024 में हाईकोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया।कोर्ट ने कहा कि सरकार को खुद ही तय करने का अधिकार देना कि कौन सी खबर फर्जी है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर खतरा बन सकता है।

व्यंग्य और आलोचना पर खतरे की दलील

इस मामले में याचिकाकर्ता कॉमेडियन Kunal Kamra ने तर्क दिया कि ऐसा कानून व्यंग्य और आलोचना को दबाने का माध्यम बन सकता है। उनका कहना था कि डिजिटल दुनिया में हास्य और व्यंग्य भी लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का हिस्सा हैं।

सरकार का पक्ष क्या है

सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की ओर से Tushar Mehta ने कहा कि इस नियम का उद्देश्य आलोचना को रोकना नहीं है। सरकार का कहना है कि इसका मकसद सिर्फ गलत सूचना से होने वाले नुकसान को रोकना है, खासकर तब जब फेक खबरें संस्थाओं और सुरक्षा तंत्र को प्रभावित करती हैं।

सुप्रीम कोर्ट का संतुलित रुख

सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। लेकिन मामले की गंभीरता को देखते हुए इसे तीन जजों की बड़ी बेंच को सौंप दिया गया है। कोर्ट ने सभी पक्षों को चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने को कहा है।

डिजिटल युग का बड़ा सवाल

आज खबरें सिर्फ अखबारों से नहीं, बल्कि फोन की स्क्रीन से बनती और बिगड़ती हैं। यही वजह है कि अदालत अब उस रेखा को तय करने की कोशिश कर रही है जहां फेक न्यूज़ पर लगाम भी लगे और अभिव्यक्ति की आज़ादी भी सुरक्षित रहे।

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