अमेरिकी हमले के बाद ईरानी युद्धपोत ने भारत में ली शरण, कोच्चि में रुका IRIS लावन

सरवर
सरवर

मिडिल ईस्ट की जंग अब सिर्फ रेगिस्तानों और तेल के कुओं तक सीमित नहीं रही। इसकी लपटें अब हिंद महासागर तक पहुंचती दिख रही हैं। अमेरिकी हमले में एक ईरानी जहाज के तबाह होने के बाद अब दूसरा युद्धपोत भारत के कोच्चि बंदरगाह पर आकर रुका है। सवाल सिर्फ तकनीकी खराबी का नहीं है यह उस भू-राजनीतिक खेल की झलक है जिसमें हर बंदरगाह और हर जहाज मायने रखता है।

अमेरिकी हमले के बाद भारत पहुंचा ईरानी युद्धपोत

मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच ईरान का युद्धपोत IRIS लावन भारत के कोच्चि पोर्ट पर पहुंच गया है। सरकारी सूत्रों के हवाले से खबर है कि जहाज में तकनीकी खराबी आने के बाद ईरान ने भारत से मदद मांगी थी। भारत ने मानवीय और तकनीकी आधार पर जहाज को डॉक करने की अनुमति दे दी।

बताया जा रहा है कि यह जहाज 4 मार्च को कोच्चि बंदरगाह पर पहुंचा।

183 क्रू मेंबर फिलहाल भारत में

IRIS लावन पर मौजूद 183 क्रू मेंबर फिलहाल कोच्चि में भारतीय नौसेना की सुविधाओं में ठहरे हुए हैं। जहाज की तकनीकी जांच की जा रही है और यह पता लगाया जा रहा है कि खराबी कितनी गंभीर है और इसे ठीक होने में कितना समय लगेगा। भारतीय नौसेना की तरफ से इस मामले को संवेदनशील मानते हुए पूरी निगरानी रखी जा रही है।

पहले जहाज पर हुआ था अमेरिकी हमला

यह घटना ऐसे समय हुई है जब हाल ही में ईरान के एक अन्य जहाज IRIS डेना पर अमेरिका ने हमला किया था। यह जहाज भारत से लौट रहा था और उसने मिलान मल्टीलेटरल नेवल एक्सरसाइज में हिस्सा लिया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक उस हमले में करीब 87 ईरानी नाविकों की मौत हो गई थी। इस घटना ने पहले ही क्षेत्र में तनाव को चरम पर पहुंचा दिया था।

क्या भारत का बंदरगाह बन रहा है रणनीतिक ठिकाना?

विश्लेषकों का मानना है कि यह सिर्फ तकनीकी खराबी का मामला नहीं हो सकता। मिडिल ईस्ट में चल रही जंग के बीच किसी ईरानी युद्धपोत का भारतीय बंदरगाह पर आना कई रणनीतिक सवाल खड़े करता है। भारत आधिकारिक तौर पर तटस्थ नीति पर कायम है, लेकिन क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना भी उसके लिए उतना ही जरूरी है।

ताइवान ने भी जताई चिंता

ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव को लेकर अंतरराष्ट्रीय चिंता भी बढ़ रही है। ताइवान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के उप महासचिव विंसेंट यी-शियांग चाओ ने कहा कि इस संघर्ष का असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा।

उनके मुताबिक इसका प्रभाव ऊर्जा बाजार, वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय बाजारों पर साफ दिखाई देने लगा है।

जंग की लपटें अब वैश्विक हो चुकी हैं

मिडिल ईस्ट में शुरू हुआ यह संघर्ष अब धीरे-धीरे वैश्विक राजनीति का केंद्र बनता जा रहा है। तेल बाजार में उतार-चढ़ाव, समुद्री रास्तों पर खतरा और महाशक्तियों की बढ़ती सैन्य मौजूदगी यह संकेत दे रही है कि आने वाले दिनों में हालात और जटिल हो सकते हैं। और इसी बीच कोच्चि में खड़ा एक ईरानी युद्धपोत दुनिया को याद दिला रहा है कि जंग सिर्फ मोर्चे पर नहीं लड़ी जाती—कभी-कभी बंदरगाह भी उसके अहम किरदार बन जाते हैं।

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