
शनिवार को राजधानी की रफ्तार अचानक स्लो मोशन में बदल गई। परिवर्तन चौक पर सवर्ण समाज के प्रदर्शन ने ऐसा ट्रैफिक चक्रव्यूह बनाया कि आसपास की सड़कों पर गाड़ियाँ इंच-इंच सरकती रहीं। आईटी चौराहे से लेकर हजरतगंज और कैसरबाग की ओर जाने वाले मार्गों पर दोपहर तक लंबी कतारें लग गईं। शहर मानो एक्सेलरेटर छोड़कर ब्रेक पर खड़ा था।
बोर्ड परीक्षार्थियों की बढ़ी टेंशन
सबसे ज्यादा असर उन छात्रों पर पड़ा जो बोर्ड परीक्षा देने निकल रहे थे। कई अभिभावकों ने बताया कि परीक्षा केंद्र तक पहुँचने में सामान्य से दोगुना समय लगा। कुछ बच्चे समय से काफी पहले घर से निकले, फिर भी जाम की गिरफ्त से बच नहीं सके।
तेज धूप, ट्रैफिक का धुआँ और एग्जाम का प्रेशर। यह कॉम्बिनेशन किसी भी स्टूडेंट के लिए कम चुनौती नहीं। अभिभावकों की नाराजगी साफ दिखी। सवाल सीधा था, “जब पहले से जानकारी थी, तो तैयारी क्यों नहीं?”
प्रशासन की तैयारी पर सवाल
स्थानीय लोगों का कहना है कि पुलिस और प्रशासन को प्रदर्शन की पूर्व सूचना थी। फिर वैकल्पिक रूट प्लान पहले से एक्टिव क्यों नहीं किया गया? न तो बड़े पैमाने पर ट्रैफिक डायवर्जन की स्पष्ट सूचना दी गई, और न ही प्रमुख चौराहों पर पर्याप्त पुलिस बल नजर आया।
परिणाम वही पुराना, जाम में फँसी एंबुलेंस, दफ्तर जाने वाले कर्मचारी, मरीज और छात्र।

“हर बार आम जनता ही क्यों पिसे?”
शहरवासियों की मांग है कि प्रशासन को रियल टाइम ट्रैफिक मैनेजमेंट, वैकल्पिक मार्गों की स्पष्ट घोषणा और डिजिटल पब्लिक अलर्ट सिस्टम को मजबूत करना चाहिए। लोकतंत्र की आवाज जरूरी है, पर शहर की सांस भी।
यह घटना प्रशासन के लिए चेतावनी है कि बड़े आयोजनों या प्रदर्शनों के दौरान proactive traffic planning अनिवार्य है।लखनऊ जैसे तेजी से बढ़ते शहर में ट्रैफिक सिर्फ सड़क पर नहीं, व्यवस्था पर भी चलता है।
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