Epstein फाइल्स से दिल्ली तक सियासी धमाका! संसद में ‘इस्तीफा दो’ की गूंज

शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

भारतीय राजनीति में उस वक्त हलचल मच गई जब दुनिया के कुख्यात फाइनेंसर Jeffrey Epstein का नाम अचानक संसद की बहसों में गूंजने लगा। मामला केवल अंतरराष्ट्रीय दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सीधे केंद्र सरकार के वरिष्ठ मंत्री Hardeep Singh Puri तक पहुंच गया।

शुक्रवार को संसद का माहौल ऐसा था मानो चुनावी रैली सदन के भीतर शिफ्ट हो गई हो। विपक्षी सांसदों ने बैनर, पोस्टर और नारों के साथ सरकार को घेर लिया। “इस्तीफा दो” की गूंज सत्ता पक्ष के लिए असहज क्षण बन गई।

पवन खेड़ा का वार: “नैतिकता पहले, पद बाद में”

कांग्रेस नेता Pawan Khera ने मीडिया से बातचीत में सीधा आरोप लगाया कि मंत्री को पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं है। विपक्ष का तर्क साफ है जब नाम एक संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय केस से जुड़ जाए, तो पारदर्शिता सर्वोपरि होनी चाहिए।

सियासी रणनीति भी स्पष्ट है: मुद्दे को सिर्फ सदन तक सीमित नहीं रखना, बल्कि इसे जनता के बीच ले जाना।

चिंगारी कहाँ से भड़की?

पूरे विवाद की शुरुआत तब हुई जब Rahul Gandhi ने दावा किया कि अमेरिका में सामने आई ‘Epstein Files’ में संबंधित मंत्री का नाम दर्ज है। इस बयान ने सोशल मीडिया से लेकर टीवी डिबेट तक, हर मंच पर बहस छेड़ दी। विपक्ष का कहना है कि जब तक जांच पूरी न हो, तब तक जवाबदेही तय होनी चाहिए।

मंत्री का जवाब: “मुलाकात हुई, पर आरोप निराधार”

दबाव बढ़ने पर हरदीप सिंह पुरी ने सफाई दी कि उनकी मुलाकातें औपचारिक और सार्वजनिक कार्यक्रमों के दौरान हुई थीं, और उनका किसी आपराधिक गतिविधि से कोई संबंध नहीं। उन्होंने आरोपों को “राजनीति से प्रेरित” बताया।

सरकार का रुख साफ है — यह एक राजनीतिक नैरेटिव बनाने की कोशिश है। लेकिन विपक्ष पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा।

“भारत की संसद में अब फाइलें सिर्फ कागज़ नहीं, ग्लोबल ट्रेंडिंग टॉपिक भी बन गई हैं। अगली बार शायद Netflix को भी प्रेस गैलरी में सीट मिल जाए!”

अब असली सवाल है — क्या यह मुद्दा सिर्फ मीडिया सर्कल तक रहेगा या जांच और राजनीतिक दबाव इसे और बड़ा रूप देंगे? आने वाले दिनों में यह विवाद संसद के एजेंडे और सियासी समीकरणों दोनों को प्रभावित कर सकता है।

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