
राष्ट्रपति के संयुक्त सत्र को संबोधित करने के बाद उस पर संसद में चर्चा होती है और अंत में प्रधानमंत्री का जवाब — यही लोकतांत्रिक परंपरा रही है। लेकिन इस बार लोकसभा में हालात ऐसे बने कि परंपरा को ही ब्रेक लग गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भाषण बुधवार शाम 5 बजे तय था, मगर सदन में बढ़ते हंगामे ने कार्यवाही को स्थगित करा दिया। नतीजा—PM बोले ही नहीं।
विपक्ष का हंगामा, सदन ठप
कांग्रेस समेत विपक्षी दलों के सांसदों ने जोरदार विरोध किया। पोस्टर, नारे और शोर के बीच सदन चलने के बजाय ठहर गया। हालात इतने बिगड़े कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव प्रधानमंत्री के जवाब के बिना ही स्वीकार कर लिया गया।
यह कोई छोटी बात नहीं है — क्योंकि यही वो मौका होता है जब सरकार सीधे पूरे सदन को जवाब देती है।
सिर्फ 3 सांसद, बाकी सब Noise
इस बार राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा में केवल तीन सांसद ही अपनी बात पूरी कर पाए इसके बाद भारी हंगामे में कार्यवाही स्थगित। मतलब मुद्दे बोलने से पहले ही माइक हार गया, शोर जीत गया।

2004 की यादें ताज़ा
ऐसा इतिहास में बहुत कम हुआ है। इससे पहले 2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी राष्ट्रपति के अभिभाषण पर जवाब नहीं दे पाए थे। करीब 20 साल बाद, एक बार फिर लोकसभा में PM के भाषण के बिना धन्यवाद प्रस्ताव पास हुआ।
इतिहास खुद को दोहरा रहा है — फर्क सिर्फ इतना है कि तब राजनीतिक बदलाव था, अब राजनीतिक टकराव।
लोकतंत्र में ‘Reply Pending’
संसद सवालों के लिए होती है, जवाबों के लिए होती है, लेकिन जब जवाब का वक्त आए और सदन ही बंद हो जाए तो लोकतंत्र पर “Reply Pending” की मुहर लग जाती है।
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