
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने आज सुबह 10:17 बजे सतीश धवन स्पेस सेंटर, श्रीहरिकोटा से PSLV-C62 रॉकेट लॉन्च किया। देश के लिए इसे “Divya Drishti Mission” कहा जा रहा था।
लॉन्चिंग तकनीकी रूप से सफल रही, लेकिन सैटेलाइट डिप्लॉयमेंट नहीं हो सका, और यहीं आकर भारत का एक ऐतिहासिक सपना फिलहाल ऑर्बिट में अटक गया।
PS3 स्टेज में आई गड़बड़ी, ISRO अलर्ट मोड में
ISRO ने आधिकारिक बयान में कहा कि PS3 चरण के अंत में एक असामान्य स्थिति (Anomaly) सामने आई, जिसके चलते सैटेलाइट्स तय ऑर्बिट में तैनात नहीं हो पाए।
ISRO का कहना है कि पूरे मिशन का डिटेल्ड फेल्योर एनालिसिस शुरू कर दिया गया है।
64वीं उड़ान भरने वाला PSLV… लेकिन मंज़िल अधूरी।
क्यों था ये मिशन गेम-चेंजर?
अगर PSLV-C62 मिशन पूरी तरह सफल हो जाता, तो भारत अंतरिक्ष में सैटेलाइट रिफ्यूलिंग तकनीक हासिल करने वाला दुनिया का दूसरा देश बन जाता।
अब तक यह कामयाबी सिर्फ चीन के पास है। अमेरिका और यूरोप अब भी इस रेस में पीछे हैं। यानी — चांद-मंगल के बाद ISRO सीधे Future Space Economy की ओर उड़ान भर रहा था।
15 सैटेलाइट्स, लेकिन ऑर्बिट तक नहीं पहुंच पाए
इस मिशन के तहत EOS-N1 ‘अन्वेषा’, NSIL के ज़रिए 14 अन्य सैटेलाइट्स को Sun Synchronous Orbit (SSO) में तैनात किया जाना था।
PSLV-C62 को थाईलैंड + ब्रिटेन की जॉइंट टेक्नोलॉजी से तैयार किया गया था — जो इसे और खास बनाता है।

Anvesha Satellite क्यों है इतना खास?
अन्वेषा (EOS-N1) सिर्फ एक अर्थ ऑब्ज़र्वेशन सैटेलाइट नहीं है — ये भारत की आंखें और कान बनने वाला था।
- Advanced Spy-Grade Imaging Capability
- Hyper Spectral Remote Sensing (HRS)
- सैकड़ों किलोमीटर ऊपर से दुश्मन के ठिकानों की हाई-रेजोल्यूशन तस्वीरें
- बारीक से बारीक कलर और चमक (Spectral Signature) की पहचान
सीधे शब्दों में कहें तो — अन्वेषा देखती नहीं, पहचानती है।
Space में पहली बार Internal Refueling का प्लान
बेंगलुरु की स्टार्टअप OrbitAID का 25 किलो का Ithlusat चार घंटे के भीतर अंतरिक्ष में पहली बार इंटरनल सैटेलाइट रिफ्यूलिंग करने वाला था।
यही टेक्नोलॉजी भविष्य में Space Stations, On-Orbit Servicing, Military सैटेलाइट्स की उम्र कई साल बढ़ा सकती है।
लॉन्च से पहले तिरुपति में पूजा
ISRO चेयरमैन वी. नारायणन ने परंपरा निभाते हुए लॉन्च से पहले तिरुपति बालाजी मंदिर में पूजा-अर्चना की। पिछले साल मई में PSLV मिशन फेल हुआ था, इसलिए आज का लॉन्च कमबैक मिशन माना जा रहा था।
लेकिन किस्मत ने कहा — “अभी और सीखना बाकी है।”
ISRO फेल नहीं हुआ, ISRO सीख रहा है
ISRO की खासियत यही है — फेल्योर छुपाता नहीं, डेटा एनालाइज करता है और अगली उड़ान और मजबूत बनाता है। आज भले ही सैटेलाइट ऑर्बिट में न पहुंचे हों, लेकिन भारत का स्पेस फ्यूचर अब भी सही ट्रैक पर है।
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