
टी. प्रकाश राव के निर्देशन में बनी फिल्म ‘सूरज’, राजसी प्रेम कहानी को उस दौर की मसालेदार बॉलीवुड स्टाइल में परोसती है। यहाँ नायक सूरज सिंह (राजेंद्र कुमार) सिर्फ दिल चुराता नहीं, बल्कि राजकुमारी भी चुरा लेता है – वो भी घोड़े पर बैठकर, जैसे हॉलीवुड और राजश्री की फिल्मों में होता है।
कथानक: कौन राजकुमार, कौन डाकू?
राजकुमार प्रताप की गद्दी पर बैठा है वो, जो असल में संग्राम सिंह का बेटा है! और असली राजकुमारी को डाकू सूरज उठा ले जाता है — बस यहीं से शुरू होती है बवाल, स्वैग और फूल बरसाने वाली बहारें।
सूरज सिंह को अगर आज ट्विटर मिल जाता, तो वो kidnapping को “Express Romance” कहकर ट्रेंड करा देता।
संगीत: जब बहारों ने वाकई फूल बरसाए
शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने वो कर दिखाया, जो आजकल AutoTune भी नहीं कर सकता। गीत “बहारों फूल बरसाओ” और “तितली उड़ी उड़ जो चली” इतने हिट हुए कि मोहम्मद रफ़ी और शारदा के गले से निकली आवाज़ आज भी रेडियो पे गूंजती है।
हिट गाने:
-
बहारों फूल बरसाओ – मोहम्मद रफ़ी का इमोशनल गुलदस्ता
-
तितली उड़ी उड़ जो चली – शारदा की सबसे आइकॉनिक परफॉर्मेंस
-
चेहरे पे गिरिन जुल्फें – रोमांस का परफ्यूम, 60s स्टाइल
संगीत समीक्षा Verdict: ये एल्बम नहीं, उस दौर का Spotify Wrapped है।
बॉक्स ऑफिस और अवार्ड्स: राजेंद्र कुमार की आखिरी रजत जयंती
-
फिल्म ने करीब ₹5 करोड़ कमाए (1966 के हिसाब से टॉप टियर!)
-
बनी साल की दूसरी सबसे बड़ी हिट

-
फिल्मफेयर में हसरत जयपुरी और मोहम्मद रफ़ी ने “बहारों फूल बरसाओ” के लिए अवॉर्ड्स बटोर लिए
किरदारों का जलवा: जब हर फ्रेम पोस्टर जैसा था
-
राजेंद्र कुमार – डाकू भी बने, डैशिंग भी लगे
-
वैजयंतीमाला – हर सीन में राजसी ठाठ
-
मुमताज – साइड रोल में भी सेंटर स्टेज
-
अजीत – राजकुमार या रीतिकुमार?
सूरज अब भी चमकता है
‘सूरज’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, वो दौर है जब म्यूज़िक स्कोर में जादू होता था और हीरो घोड़े पे आता था। इस फिल्म में वो सब कुछ है जो आज के मेकर्स सिर्फ रीमेक में ढूंढते हैं – राजसी ड्रामा, अपहरण, पहचानों की अदला-बदली और लव सॉन्ग्स जो दिल में बस जाएं।
“सूरज सिंह की तरह, अगर हर डाकू ऐसा रोमांटिक होता… तो पुलिस के बजाए, फैशन डिजाइनर उनके पीछे होते!”
आईएएस सिद्धार्थ का इस्तीफा: क्या नीतीश के सचिव चुनाव लड़ेंगे नवादा से?
