आचार्य प्रमोद कृष्णम: सेवक से ‘जगतगुरु’ तक कल्कि धाम में सम्मान का ऐतिहासिक क्षण

साक्षी चतुर्वेदी
साक्षी चतुर्वेदी

गुरुवार को कल्कि धाम में आयोजित ‘कल्कि स्थापना दिवस’ समारोह एक आध्यात्मिक और ऐतिहासिक क्षण का साक्षी बना। समारोह के दौरान कल्कि पीठाधीश्वर Acharya Pramod Krishnam को ‘जगतगुरु’ की उपाधि से सम्मानित किया गया।

यह सम्मान उन्हें Akhil Bharatiya Akhada Parishad के अध्यक्ष Mahant Ravindra Puri द्वारा प्रदान किया गया।

समारोह में आनंद अखाड़े के महामंडलेश्वर और विभिन्न अखाड़ों के संतों की गरिमामयी उपस्थिति रही। फूलों की वर्षा और वैदिक मंत्रोच्चार के बीच यह सम्मान प्रदान किया गया।

संतों की मौजूदगी में विशेष घोषणा

आनंद अखाड़े के महामंडलेश्वर स्वामी बालकानंद गिरी महाराज ने घोषणा की कि अब कल्कि पीठाधीश्वर पूज्य पाद ‘जगतगुरु स्वामी प्रमोद कृष्णम भारतीजी महाराज’ के नाम से जाने जाएंगे। यह घोषणा केवल एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि सनातन परंपरा में एक विशिष्ट मान्यता का प्रतीक थी।

“मैं सनातन का सेवक हूं” — प्रमोद कृष्णम

सम्मान प्राप्त करने के बाद आचार्य प्रमोद कृष्णम ने विनम्रता व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उन्हें ऐसी उपाधि मिलेगी।

उन्होंने कहा, “मैं अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष रवींद्र पुरी का हृदय से आभार व्यक्त करता हूं। मैं स्वयं को सनातन धर्म का सेवक मानता हूं। मेरा जीवन श्री कल्कि धाम और सनातन के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित है।”

उनके शब्दों में विनम्रता झलक रही थी उपाधि से अधिक जिम्मेदारी का भाव।

कल्कि धाम का महत्व

कल्कि धाम को सनातन परंपरा में विशेष महत्व दिया जाता है। यह स्थान भगवान कल्कि के संदेश और धर्म के पुनरुत्थान के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। स्थापना दिवस समारोह में संतों की उपस्थिति और अखाड़ा परिषद की भागीदारी ने इसे राष्ट्रीय स्तर की आध्यात्मिक घटना बना दिया।

सम्मान से अधिक जिम्मेदारी

‘जगतगुरु’ की उपाधि केवल सम्मान नहीं, बल्कि दायित्व भी है। यह एक आध्यात्मिक नेतृत्व का प्रतीक है, जो समाज को दिशा देने की अपेक्षा रखता है। प्रमोद कृष्णम ने स्वयं को “जगत का सेवक” बताते हुए यह संकेत दिया कि उनके लिए यह उपाधि प्रतिष्ठा से अधिक सेवा का अवसर है।

कल्कि धाम का यह समारोह केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं था, बल्कि परंपरा, आस्था और नेतृत्व का संगम था। सेवक भाव से शुरू हुई यात्रा का ‘जगतगुरु’ उपाधि तक पहुँचना — यह सनातन परंपरा में सम्मान और उत्तरदायित्व दोनों का प्रतीक है।

आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि आचार्य प्रमोद कृष्णम इस नई भूमिका में सनातन और समाज के लिए किस प्रकार कार्य करते हैं। आख़िरकार, उपाधि शब्दों से नहीं, कर्म से सिद्ध होती है।

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