न दोषी बचे, न निर्दोष फंसे! UGC नियमों पर अखिलेश की ‘मिडिल लाइन’

अजमल शाह
अजमल शाह

देश के उच्च शिक्षा संस्थानों में जातिगत भेदभाव रोकने के उद्देश्य से लाए गए UGC के नए नियम 2026 अब विवाद के केंद्र में आ गए हैं।
उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में general category students और छात्र संगठनों ने इन नियमों के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए इन्हें discriminatory बताया है।

Akhilesh Yadav की सधी हुई प्रतिक्रिया

इस संवेदनशील मुद्दे पर समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने संतुलित बयान दिया।
उन्होंने कहा— “दोषी बचे नहीं, और निर्दोष फंसे नहीं।”

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह बयान नियमों के उद्देश्य और उनके संभावित दुरुपयोग—दोनों के बीच balance बनाने की कोशिश है।

UGC के नए नियम क्या कहते हैं?

UGC ने 13 जनवरी 2026 को ‘Promotion of Equity in Higher Education Institutions Rules, 2026’ जारी किए हैं, जो 2012 के पुराने नियमों की जगह लेंगे।

इनके तहत सभी सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों/कॉलेजों में Equity Committee बनाना अनिवार्य। यह कमेटी भेदभाव से जुड़ी शिकायतों की जांच करेगी। कैंपस में inclusive environment सुनिश्चित करेगी। कमेटी में SC, ST, OBC, दिव्यांग और महिला प्रतिनिधित्व अनिवार्य होगा।

विरोध क्यों तेज हो रहा है?

कुछ छात्र संगठनों और सामान्य वर्ग के समूहों का कहना है कि नियमों का misuse संभव है। इससे संस्थानों की autonomy प्रभावित हो सकती है। कैंपस में विवाद और तनाव बढ़ सकता है।

यही आशंकाएं इस मुद्दे को policy से ज़्यादा political flashpoint बना रही हैं।

सरकार का पक्ष: ‘डरने की जरूरत नहीं’

विवाद के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने स्पष्ट किया कि नियम किसी वर्ग को परेशान करने के लिए नहीं हैं। इनके दुरुपयोग की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी गई है। उद्देश्य सिर्फ equality और justice सुनिश्चित करना है। सरकार का कहना है कि ये नियम safeguards के साथ लागू किए जाएंगे।

अखिलेश का बयान क्यों अहम?

अखिलेश यादव का बयान इस पूरी बहस में एक moderate voice के रूप में देखा जा रहा है। उनका संदेश साफ है, भेदभाव करने वालों को सज़ा मिले। लेकिन नियमों की आड़ में निर्दोष छात्रों या शिक्षकों को परेशान न किया जाए।

यानी policy भी चले, और fairness भी बना रहे।

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