UGC का नया नियम, कैंपस में पुरानी आग: Merit vs Equality फिर आमने-सामने

गौरव त्रिपाठी
गौरव त्रिपाठी

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए ‘Equity Regulation 2026’ ने उच्च शिक्षा की बहस को अचानक सड़कों तक खींच लाया है। दिल्ली, उत्तर प्रदेश और कुछ अन्य राज्यों में छात्र संगठनों और शिक्षकों के प्रदर्शन ने साफ कर दिया है कि यह सिर्फ एक अकादमिक सुधार नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक टकराव का नया फ्रंट बन चुका है।

क्या है UGC का नया इक्विटी रेगुलेशन?

UGC का दावा है कि यह नियम उच्च शिक्षा में समान अवसर (Equal Representation) सुनिश्चित करने के लिए लाया गया है। नई व्यवस्था के तहत एडमिशन, फैकल्टी चयन और रिसर्च फंडिंग में सामाजिक संतुलन को प्राथमिकता दी जाएगी।
लेकिन विरोध करने वालों का तर्क है कि यह व्यवस्था Merit-based system को कमजोर करती है और योग्यता को पीछे धकेलती है।

दिल्ली-UP में क्यों भड़का ज्यादा विरोध?

दिल्ली और उत्तर प्रदेश में ऊंची जाति के छात्र संगठनों ने इसे “reverse discrimination” करार दिया है। आज 27 जनवरी को UGC मुख्यालय के घेराव की घोषणा ने माहौल को और गरमा दिया।

प्रदर्शनकारियों का कहना है, “अगर सब बराबर हैं, तो अलग नियम क्यों?”

इस्तीफों ने डाला और पेट्रोल

विवाद तब और गहराया जब हाल ही में एक सिटी मजिस्ट्रेट और सत्तारूढ़ दल से जुड़े युवा नेता के इस्तीफे सामने आए। इन घटनाओं ने UGC नियमों को सिर्फ छात्र आंदोलन नहीं, बल्कि administrative rebellion का रंग दे दिया।

कैंपस टू कैंपस: बंटी हुई राय

लखनऊ और पटना यूनिवर्सिटी में छात्रों का रुख बंटा हुआ दिखा—कुछ ने इसे progressive reform बताया, तो कुछ ने academic dilution का डर जताया।

पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ में छात्र संगठनों ने नियमों का खुला समर्थन करते हुए कहा कि यह सामाजिक न्याय की दिशा में जरूरी कदम है।

वहीं करणी सेना ने भारत बंद और संसद घेराव जैसी चेतावनियां देकर टकराव को और तीखा कर दिया।

किताबों से ज्यादा अब नारे पढ़े जाएंगे?

विडंबना यह है कि जिन कैंपसों में कभी syllabus, seminar और शोध पर बहस होती थी, वहां अब जाति, पहचान और राजनीति का syllabus चल रहा है।
UGC equity की बात कर रहा है, छात्र merit की—और बीच में फंसी है भारतीय उच्च शिक्षा, जो हर सुधार में पहले सड़क पर उतरती है, क्लासरूम में बाद में।

सरकार और UGC के लिए यह सिर्फ नियम बचाने की लड़ाई नहीं, बल्कि विश्वसनीयता की परीक्षा है। अगर संवाद नहीं हुआ, तो यह आंदोलन आने वाले महीनों में चुनावी मुद्दा भी बन सकता है।

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