दिल्ली की हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया दरगाह में बसंत पंचमी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि 700 साल पुरानी एक ज़िंदा परंपरा है। यह परंपरा न कैलेंडर देखती है, न धर्म की दीवारें—यह बसंत, संगीत और इंसानी जुड़ाव की कहानी कहती है। Amir Khusrau से शुरू हुई परंपरा इतिहास बताता है कि जब सूफी संत निज़ामुद्दीन औलिया अपने प्रिय शिष्य के वियोग में उदास थे, तब अमीर खुसरो ने बसंत पंचमी के दिन पीले कपड़े पहनकर, सरसों के फूल लाकर और गीत गाकर अपने गुरु का मन बहलाया।वहीं से जन्म हुआ—इस अनोखी…
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