“तिरंगा सिर पर, पगड़ी जट्टा सम्हाल रे!” — ये कोई मेटा-फोर्स डायलॉग नहीं, बल्कि 60s की वो देशभक्ति थी जो आज भी रोंगटे खड़े कर दे। असेंबली में बम और कैमरे में क्रांति शुरुआत होती है इंडिया के 1911 से — जहां भगत सिंह अपने चाचा अजित सिंह की गिरफ़्तारी देखता है और बचपन से ही क्रांति का Zoom-Call join कर लेता है। लाला लाजपत राय की मौत हो, या असेम्बली में धमाका, भगत सिंह की एंट्री हैट के साथ होती है — literally! और फिर आती है फांसी की…
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रेट्रो रिव्यू: “वो कौन थी?” – और आज तक किसी को नहीं पता
राज खोसला निर्देशित ‘वो कौन थी’ (1964) एक ऐसी रहस्यमयी थ्रिलर है, जो शुरू होते ही सवाल छोड़ देती है – “कौन थी वो सफेद साड़ी वाली लड़की जो रात की बारिश में टैक्सी रुकवाती है?” और दर्शक 2 घंटे 25 मिनट तक यही सोचता रह जाता है – “अरे भाई, कोई तो बताए!” ‘एक फूल दो माली’ रिव्यू: बलराज साहनी और संजय खान की क्लासिक प्लॉट का मजा: जहां प्यार भी है… और प्रेत भी? फिल्म की शुरुआत होती है एक अजनबी लड़की से जो बारिश में डॉक्टर आनंद…
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