रेट्रो रिव्यू चरस: “धर्मेंद्र Vs ड्रग माफिया — चरस में जलवा ही जलवा था!”

“चरस” सिर्फ एक मसाला फिल्म नहीं थी, बल्कि 1972 में ईदी अमीन द्वारा भारतीयों को युगांडा से निकाले जाने की सच्ची घटनाओं से प्रेरित थी। रामानंद सागर ने इसे बनाया और धर्मेंद्र ने इसे “धो डाला”! एक NRI फैमिली की त्रासदी, ड्रग तस्करी, माफिया से मुठभेड़ और सस्पेंस का झूला — सब कुछ इस फिल्म में है। प्लॉट का पंच: धर्मेंद्र का “माल्टा मिशन” धर्मेंद्र उर्फ सूरज कुमार, युगांडा से भागता है, बहन को खो बैठता है, बाप सदमे से मर जाता है — और फिर शुरू होती है उसकी…

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रोटी रिव्यू (1974): जब अपराधी बना मास्टरजी और पब्लिक बन गई पागल

अगर आप सोचते हैं कि रोटी सिर्फ आटे और पानी से बनती है — तो जनाब आप मनमोहन देसाई की फिल्म ‘रोटी’ नहीं देखे हैं। यहां राजेश खन्ना aka मंगल सिंह है जो फांसी से भागकर सीधे मास्टरजी बन जाता है। वो भी बिना B.Ed. किए। मुमताज़ हैं बिजली, जो इतनी पॉजिटिव है कि किसी को भी लाइन पर ला सकती हैं — और यहां तक कि एक अपराधी को भी टीचर बना देती हैं। भेष बदलो, माता-पिता चुरा लो, और फिर अपराध बोध में रहो मंगल सिंह ने जिस…

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आया सावन झूम के (1969) रेट्रो रिव्यू: धर्मेन्द्र फंस गए इमोशनल मडस्लाइड में

बारिश, मंदिर, बेबी ड्रॉप-ऑफ और धर्म संकट – एकदम 60s क्लासिक सेटअप।निरूपा रॉय यहां भी ट्रेजेडी का पैकेज लेकर आती हैं – नौकरानी बनी हैं, गलती से मालिक को मार बैठती हैं और फिर बेटा छोड़ देती हैं। इससे ज़्यादा बैकस्टोरी अगर Netflix पे होता, तो 3 सीज़न में भी खत्म न हो! धर्मेन्द्र vs भावनाएं: जयशंकर उर्फ़ जय (धर्मेन्द्र) बिजनेस मैन हैं, मगर दिल से Confusion-प्रेमी। आरती (आशा पारेख) से रोमांस शुरू हुआ ही था कि उन्होंने उसके बाप को अनजाने में गाड़ी से कुचल दिया (जैसे गलती से…

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