लखनऊ की ज़ुबान: सिर्फ नवाबों के शहर में बोले जाने वाले अलहदा शब्द

लखनऊ, जहां चाय से ज़्यादा “तशरीफ़” का महत्व है, और “क्या हाल है?” से पहले “हुज़ूर” लगा देना ज़रूरी समझा जाता है। यहां भाषा सिर्फ बातचीत का ज़रिया नहीं, बल्कि नवाबी ठाठ का एक अंग है। बक्का – जब कुछ पक्का से भी ज़्यादा पक्का हो! “Arey बक्का बता रहे हैं, भाई साहब!”यह शब्द सुनने में सीधा-सादा लगे, लेकिन लखनऊ में इसकी हैसियत शपथ से कम नहीं। बक्का मतलब – शुद्ध देसी, बिना मिलावट वाला ‘सच’। बच्चा बोले तो Cute, लखनवी बोले तो “बक्का कसम से!”  फट्टा – डर का…

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