
उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर जिले के लंभुआ से बीजेपी विधायक सीताराम वर्मा का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही सियासी हलकों में हलचल मच गई।
वीडियो में एक स्वस्थ व्यक्ति को व्हीलचेयर पर बैठाकर रिकॉर्डिंग करवाई जाती दिख रही है — और यहीं से शुरू हुआ विवाद। कुछ देर में वो व्यक्ति अपने पैरो पर खड़ा नजर आता है।
क्या दिखा वायरल वीडियो में?
वायरल क्लिप में— एक ऐसा व्यक्ति व्हीलचेयर पर बैठा दिखता है, जो स्पष्ट रूप से दिव्यांग नहीं लग रहा। कैमरा ऑन है, फोटो-वीडियो लिए जा रहे हैं बस, इसके बाद सोशल मीडिया पर सवालों की बाढ़ आ गई — क्या ये मदद थी या सिर्फ optics?
MLA की सफाई: ‘पिता को दी गई थी व्हीलचेयर’
विवाद बढ़ने पर विधायक सीताराम वर्मा की ओर से सफाई आई।
उनका कहना है कि— “व्हीलचेयर दिव्यांग युवक की गैरमौजूदगी में उसके पिता को दी गई थी।”
लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं हुए।
प्रशासन की भूमिका भी घेरे में
सवाल सिर्फ विधायक पर नहीं, बल्कि— मौके पर मौजूद प्रशासन। फोटो-वीडियो की अनुमति और ground verification इन सब पर भी उठने लगे हैं।

आखिर, क्या किसी welfare activity में symbolism ज़्यादा भारी पड़ गया?
Public Perception vs Political Intent
आज के दौर में— Camera पहले ऑन होता है काम बाद में। और यहीं से perception बनता है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या जनसेवा अब content creation बन चुकी है?
चौकस सटायर
व्हीलचेयर थी मदद के लिए, लेकिन कहानी चल पड़ी PR मोड में। और जनता पूछ रही है— “जरूरतमंद कहां है, कैमरा क्यों यहां है?”
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