
भारत में जाति को लेकर बहस अक्सर शोर में बदल जाती है, जहां पहचान को विचारधारा के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है। इसी माहौल में जब मैं कहता हूँ कि “मैं सवर्ण हूँ, लेकिन सोशल जस्टिस का कट्टर समर्थक हूँ”, तो उसे या तो अपवाद माना जाता है या संदेह की नजर से देखा जाता है। जबकि हकीकत इससे कहीं ज्यादा सीधी और संवैधानिक है।
पहचान बनाम विचारधारा
सवर्ण होना कोई वैचारिक प्रमाणपत्र नहीं है, मैं जन्मा ब्राहमण लेकिन पंडित नहीं हूँ क्योंकि मैं वेदपाठी नहीं हूँ। ठीक वैसे ही जैसे सामाजिक न्याय का समर्थन किसी जाति की बपौती नहीं। Social Justice एक constitutional value है, न कि किसी समुदाय की exclusive ideology।
भारत का संविधान समानता, अवसर की बराबरी और ऐतिहासिक अन्याय के सुधार की बात करता है—बिना यह पूछे कि इसे समर्थन देने वाला किस जाति में पैदा हुआ।
विरासत क्या होती है?
मेरा यह कहना कि “सोशल जस्टिस मेरे लिए विरासत है”—कई लोगों को असहज कर सकता है। लेकिन विरासत केवल संपत्ति या उपनाम नहीं होती।
विरासत में values भी मिलती हैं—जैसे संवेदनशीलता, सवाल पूछने की आदत और privilege को पहचानने का साहस। और ये सब मिला है मुझे मेरे बुजुर्गों से।
सवर्ण समाज के भीतर भी ऐसे परिवार और परंपराएँ रही हैं, जिन्होंने जाति व्यवस्था पर सवाल उठाए, सुधार आंदोलनों का समर्थन किया और समानता को नैतिक जिम्मेदारी माना।
Privilege की स्वीकारोक्ति, अपराधबोध नहीं
सोशल जस्टिस का समर्थन करना self-hate नहीं है। यह स्वीकार करना कि समाज में कुछ लोगों को जन्म से सुविधाएँ मिलीं—और कुछ को नहीं—guilt नहीं, honesty है।
मैं जब बराबरी की बात करता हूँ, तो “अपनी सीट छोड़ने” की घोषणा नहीं कर रहा, बल्कि system को fair बनाने की बात कर रहा हूँ।

आज की बहस में असली संकट
आज समस्या यह नहीं है कि कौन किस जाति का है, बल्कि यह है कि क्या हम structural inequality को मानते हैं? क्या हम historical disadvantage को समझते हैं? और क्या हम equality को charity नहीं, right मानते हैं?
सोशल जस्टिस का विरोध अक्सर “विभाजन” के नाम पर किया जाता है, लेकिन असमानता को अनदेखा करना सबसे बड़ा विभाजन है।
सवर्ण होना बाधा नहीं
मेरे लिए सवर्ण होकर सोशल जस्टिस का समर्थन करना न तो शर्म की बात है, न अपवाद। यह उस भारत की कल्पना का हिस्सा है जहां पहचान नहीं, संविधान प्राथमिक है।
और यह सोच मुझे विरासत में मिली है—यह ऐसी विरासत है, जिसे मैं आगे बढ़ाना चाहता हूँ इस उम्मीद के साथ कि आने वाली पीढ़ियों को इसकी जरुरत ही ना पड़े।
