
संसद का शीतकालीन सत्र इस बार 1 दिसंबर से 19 दिसंबर तक चलेगा। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने जानकारी दी कि “राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सत्र के प्रस्ताव को मंज़ूरी दे दी है।”
उन्होंने कहा कि यह सत्र “रचनात्मक और सार्थक” होगा, जिससे लोकतंत्र और मज़बूत होगा। अब सवाल ये — क्या विपक्ष भी उतना ही “रचनात्मक” मूड में है?
कांग्रेस का वार: “सर्दी नहीं, सरकार की मंशा ठंडी है!”
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने सत्र की अवधि पर सवाल उठाया। “यह सत्र असामान्य रूप से छोटा और देरी से है — मात्र 15 वर्किंग डेज़! सरकार के पास न एजेंडा है, न बहस की अनुमति।”
कांग्रेस का तंज़ साफ़ है — “सत्र छोटा नहीं, लोकतंत्र की सांसें छोटी हो रही हैं।”
रिजिजू बोले — ‘कंस्ट्रक्टिव डिबेट की उम्मीद’, विपक्ष बोला — ‘पहले माइक ऑन तो रहने दो!’
किरन रिजिजू ने सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर लिखा — “हम आशा करते हैं कि यह सत्र लोकतंत्र को मज़बूत करेगा और जनता की आकांक्षाओं को पूरा करेगा।”

लेकिन विपक्ष की नज़र सत्र की “length” पर नहीं, “intent” पर है। सवाल वही पुराना — “सवाल पूछने देंगे या नहीं?”
अंदर गरमी की पूरी संभावना!
राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं गर्म हैं — सरकार इस सत्र में कोई बड़ा बिल लाएगी?
या फिर यह सत्र केवल “रिपोर्ट कार्ड और रिप्लाई कार्ड” में ही सिमट जाएगा?
सर्दियों में लोग हीटर ऑन करते हैं, सरकार ने “सत्र ऑन” कर दिया। अब देखना यह है — लोकतंत्र गरम होगा या सिर्फ़ चाय के कप!
पहली बार वोट, सीधा सवाल – नौकरी मिलेगी या फिर पलायन चालू रहेगा?
