Nandgaon Holi Controversy: Rupali Dixit ने बताई आपबीती

शालिनी तिवारी
शालिनी तिवारी

फेस्टिवल ऑफ कलर्स की चमक के बीच एक कड़वी कहानी सामने आई है। कंटेंट क्रिएटर Rupali Dixit ने सोशल मीडिया पर वीडियो साझा कर दावा किया कि Nandgaon की होली के दौरान भीड़ का फायदा उठाकर कुछ युवकों ने उनके साथ अभद्र व्यवहार किया।

वीडियो वायरल हुआ, और डिजिटल दुनिया में रंगों से ज्यादा गुस्सा उड़ा।

उत्सव या अराजकता?

Nandgaon Holi देश-विदेश में अपनी परंपरा और उत्साह के लिए जानी जाती है। यहां रंग, ढोल और भक्ति का मिश्रण होता है। लेकिन जब “जबरन रंग” निजी सीमाओं को पार कर जाए, तो उत्सव की आत्मा सवालों के घेरे में आ जाती है।

होली का मतलब “बुरा न मानो” जरूर है, पर “बुरा करो” नहीं।

भीड़ का कवच: सबसे खतरनाक हथियार

रुपाली ने आरोप लगाया कि भीड़ की आड़ लेकर निजी अंगों को निशाना बनाते हुए जबरन रंग लगाया गया। यहीं से मामला सिर्फ एक घटना नहीं, एक पैटर्न की तरह दिखने लगता है।

भीड़ कभी-कभी ढाल बन जाती है, और जिम्मेदारी धुंध में खो जाती है।

सोशल मीडिया पर गूंज

वीडियो वायरल होते ही लोगों ने तीखी प्रतिक्रिया दी। कई यूज़र्स ने महिला सुरक्षा पर सवाल उठाए, तो कई ने प्रशासन से सख्त कार्रवाई की मांग की। त्योहार की तस्वीरों के बीच यह वीडियो एक असहज सच की तरह खड़ा है।

परंपरा बनाम पर्सनल स्पेस

भारत में होली सिर्फ त्योहार नहीं, सांस्कृतिक धड़कन है। लेकिन किसी भी परंपरा की उम्र उतनी ही होती है, जितनी उसमें सम्मान बचा रहे।

Consent का रंग अगर फीका पड़ जाए, तो त्योहार का रंग भी बेरंग हो जाता है। “माहौल है” कहकर किसी की असहजता को नजरअंदाज करना, दरअसल उस माहौल को ही दूषित करता है।

प्रशासन और समाज: दोनों की परीक्षा

सवाल सिर्फ कानून का नहीं है। सवाल सामूहिक मानसिकता का है। सुरक्षा का असली टेस्ट भीड़ में ही होता है। क्योंकि वही जगह है जहां शरारत और शोषण के बीच फर्क मिटता है।

रंगों में जिम्मेदारी भी घोलिए

त्योहार खुशियों के लिए होते हैं, किसी की याद में डर जोड़ने के लिए नहीं। अगर होली को वैश्विक आकर्षण बनाए रखना है, तो “बुरा न मानो” के साथ “सीमा न लांघो” भी जोड़ना होगा। रंग तभी सुंदर लगते हैं, जब वे सहमति से लगाए जाएं।

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