
कभी ब्लैकबोर्ड पर chalk से भविष्य लिखने वाले शिक्षक आज खुद अपनी नौकरी का सवाल हल करने में फंसे हैं। मध्यप्रदेश में अचानक ऐसा “एग्जाम मोड” ऑन हुआ है कि 25 साल से पढ़ा रहे गुरुजन अब खुद टेस्ट देने की लाइन में खड़े हैं। irony इतनी मोटी है कि उसे काटने के लिए syllabus नहीं, sarcasm चाहिए।
“पुराना आदेश, नया तूफान”
स्कूल शिक्षा विभाग ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने आदेश की dust झाड़कर एक नया फरमान निकाल दिया है। संदेश साफ है, RTE 2009 से पहले नियुक्त शिक्षक भी अब TET पास करेंगे, नहीं तो exit gate खुला है।
यानी जो शिक्षक तब पढ़ा रहे थे जब स्मार्टफोन luxury था अब उन्हें digital OMR शीट पर खुद को साबित करना होगा। नियमों की timing देखकर ऐसा लगता है जैसे सिस्टम ने अचानक retro mode में जाकर “अब सबको reset करो” बटन दबा दिया हो।
“25 साल की सेवा vs 2 घंटे का पेपर”
नर्मदापुरम से सांसद दर्शन सिंह चौधरी ने इस फैसले को logic के चश्मे से देखा और चश्मा फॉग हो गया। उन्होंने केंद्रीय शिक्षा मंत्री को चिट्ठी लिखकर पूछा, “जो 25 साल से बच्चों को पास करा रहा है, उसे खुद पास होने की शर्त क्यों?” यह सवाल सिर्फ सवाल नहीं, पूरे सिस्टम के माथे पर चिपका sticky note है।
“अपनों का विरोध: BJP में ही बैकफायर”
राजनीति का दिलचस्प मोड़ यह है कि विपक्ष से पहले सत्ता पक्ष के ही नेता विरोध में उतर आए हैं। पूर्व विधायक मुरलीधर पाटीदार ने सीधा warning mode ऑन कर दिया “आदेश वापस नहीं हुआ तो आंदोलन में खुद उतरूंगा।”
मतलब यह मामला अब सिर्फ education policy नहीं, internal political परीक्षा भी बन चुका है जिसमें सवाल कठिन हैं और विकल्प सीमित।
“सड़कों पर शिक्षक: Chalk से Protest तक”
कटनी से भोपाल तक सड़कों पर भीड़ है, लेकिन ये कोई रैली नहीं ये frustration की live class है। शिक्षक संगठन rally निकाल रहे हैं, ज्ञापन दे रहे हैं और सरकार को remind करा रहे हैं कि “हम syllabus नहीं, सिस्टम हैं।”

राज्य शिक्षक संघ के अध्यक्ष जगदीश यादव ने साफ कहा अगर सरकार सुप्रीम कोर्ट में review नहीं डालती, तो हम खुद डालेंगे। यह सीधी चुनौती है, polite भाषा में wrapped।
“Ground Voice: Educator का तीखा सच”
एजुकेटर प्रभाष बहादुर ने इस पूरे मामले पर तीखा तंज कसा, “सरकार को अगर अनुभव की वैल्यू समझ आती, तो 25 साल की सेवा को OMR शीट से नहीं तौला जाता। यह शिक्षा नहीं, प्रशासनिक experiment है।”
उनकी बात में दर्द भी है और sarcasm भी… जैसे किसी teacher ने answer sheet में red pen से सिस्टम को zero दे दिया हो।
“नौकरी या न्याय: आगे क्या?”
अब सवाल सिर्फ नौकरी का नहीं dignity का है। क्या सालों की सेवा एक परीक्षा से कम हो जाएगी? या फिर सरकार backfoot पर जाकर नया रास्ता निकालेगी? फिलहाल, मध्यप्रदेश का education sector एक ऐसे crossroads पर खड़ा है जहां syllabus नहीं, survival लिखा है।
यह कहानी सिर्फ MP की नहीं है यह उस पूरे सिस्टम की है जहां experience को certificate से मापा जाता है। और irony यह है कि “teacher” अब खुद student बन गया है… लेकिन exam paper किसी और ने सेट किया है।
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