
ईरान पर US-Israel के साझा हमले ने दुनिया को चौंका दिया। रिपोर्ट्स के मुताबिक तेहरान स्थित मुख्यालय पर तेज और सटीक हमले में Ali Khamenei की मौत हो गई।
बताया जा रहा है कि मिसाइलों और फाइटर जेट्स के समन्वित प्रहार ने कुछ ही पलों में इमारत को मलबे में बदल दिया। समर्थक जिस सुरक्षा कवच को अभेद्य मानते थे, वह धुएं में बदल गया।
Donald Trump ने सोशल मीडिया पर इसे “एक क्रूर युग का अंत” बताया।
मीटिंग टाइम बदला, ऑपरेशन भी
रिपोर्ट्स के अनुसार, खामेनेई की गुप्त बैठक का समय बदला गया था। इजरायली इंटेलिजेंस को अचानक सूचना मिली कि मीटिंग शाम नहीं, सुबह होगी। यहीं से ऑपरेशन की टाइमिंग बदली। सवाल अब यह है कि इतनी सटीक लोकेशन कैसे मिली? क्या यह केवल हाई-टेक ट्रैकिंग सिस्टम था, या सिस्टम के भीतर कोई ‘इनसाइड सोर्स’?
तेहरान में अब शक की सुई बाहर से ज्यादा अंदर की ओर घूम रही है।
टेक्नोलॉजी या गद्दारी?
अगर यह पूरी तरह सैटेलाइट और सिग्नल इंटेलिजेंस का खेल था, तो पहले क्यों नहीं? इतनी क्लोज-रेंज जानकारी अक्सर ह्यूमन इंटेलिजेंस के बिना मुश्किल होती है।

ईरानी सुरक्षा एजेंसियों के लिए यह डबल शॉक है हमला भी, और भरोसे पर चोट भी।
नेतृत्वविहीन ईरान?
पूर्व राष्ट्रपति Mahmoud Ahmadinejad भी हमले में मारे गए। ईरान की राजनीतिक संरचना एक बड़े शून्य में प्रवेश कर चुकी है। सुप्रीम लीडर का कार्यालय तबाह, वरिष्ठ कमांडर हताहत, और कमान जिनके हाथ में होगी वो कैसे इसे संभालेंगे, यह बड़ा प्रश्न है। इतिहास बताता है कि सत्ता का खालीपन अक्सर स्थिरता नहीं, उथल-पुथल को जन्म देता है।
दुनिया अब सिर्फ परिणाम नहीं, प्रतिक्रिया का इंतजार कर रही है।
मिसाइलें आसमान में उड़ती हैं, लेकिन असली विस्फोट सत्ता के गलियारों में होता है। 30 सेकेंड का ऑपरेशन कभी-कभी 30 साल की राजनीति बदल देता है।
प्रश्न यह नहीं कि हमला कितना सटीक था। प्रश्न यह है कि उसके बाद का नक्शा कितना स्थिर रहेगा।
