
Siddaramaiah सरकार 16 साल से कम उम्र के छात्रों के लिए स्कूलों में मोबाइल फोन के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने की योजना बना रही है। मुख्यमंत्री ने इस मुद्दे पर राज्य के सरकारी विश्वविद्यालयों के कुलपतियों से सुझाव मांगे हैं। साफ संकेत है कि सरकार इसे केवल प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि व्यापक परामर्श के बाद लागू करना चाहती है।
यह नियम नाबालिग छात्रों पर लागू होगा, वयस्कों पर नहीं।
क्यों उठाया जा रहा है यह कदम?
शिक्षा विभाग और विशेषज्ञों का मानना है कि अत्यधिक मोबाइल इस्तेमाल बच्चों की पढ़ाई और मानसिक स्वास्थ्य दोनों पर असर डाल रहा है।
क्लास में फोन होने से फोकस बिखरता है। सोशल मीडिया का अनियंत्रित एक्सपोजर नई उम्र में जोखिम बढ़ाता है। स्क्रीन टाइम बढ़ने से तनाव, चिड़चिड़ापन और नींद की समस्या देखी जा रही है। सरकार का तर्क है कि स्कूल किताबों और संवाद का स्थान है, नोटिफिकेशन की घंटी का नहीं।
शिक्षा मंत्री का रुख
राज्य के शिक्षा मंत्री ने संकेत दिए हैं कि इस मुद्दे पर गंभीर विचार चल रहा है। जल्द ही गाइडलाइंस जारी हो सकती हैं। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि प्रतिबंध पूरी तरह होगा या केवल मनोरंजन के लिए लाए गए फोन पर सख्ती होगी। इमरजेंसी कॉल और सुरक्षा के पहलुओं पर चर्चा जारी है।
Parents vs Policy
कई अभिभावक इस प्रस्ताव का स्वागत कर रहे हैं। उनका कहना है कि इससे बच्चों का स्क्रीन टाइम कम होगा और पढ़ाई पर ध्यान बढ़ेगा।

वहीं कुछ माता-पिता सुरक्षा को लेकर चिंतित हैं। उनका सवाल है अगर बच्चा स्कूल से लौटते समय किसी आपात स्थिति में हो, तो संपर्क कैसे होगा?
यानी बहस केवल मोबाइल की नहीं, भरोसे और सुरक्षा की भी है।
Digital Discipline या Overreach?
अगर यह नियम लागू होता है, तो कर्नाटक उन राज्यों में शामिल हो जाएगा जो स्कूलों को ‘डिजिटल डिस्ट्रैक्शन फ्री जोन’ बनाने की दिशा में कदम उठा रहे हैं। यह फैसला केवल टेक्नोलॉजी का नहीं, पीढ़ी की आदतों का सवाल है।
क्या किताबें फिर से क्लास की केंद्रबिंदु बनेंगी? या फोन बैग में रहकर भी ध्यान भटकाएगा? स्क्रीन और स्लेट की इस बहस में अंतिम शब्द अभी बाकी है।
अजित पवार विमान हादसे पर बेटे का हमला: एविएशन मंत्री से इस्तीफे की मांग
