जब बाप बना विलेन और बेटा बना इंसाफ: ‘जल्लाद’ ने 90s सिनेमा हिला दिया

Saima Siddiqui
Saima Siddiqui

90 के दशक की उन फिल्मों में से एक ‘जल्लाद’ सिर्फ एक action-revenge drama नहीं है, बल्कि यह उस दौर की political hypocrisy और moral decay का कड़वा सिनेमाई आईना है।
TLV प्रसाद के निर्देशन में बनी यह bilingual फिल्म (Hindi-Bengali) दर्शकों को एक ऐसा सवाल थमा देती है, जिसका जवाब आसान नहीं— अगर गुनहगार खुद आपका पिता हो, तो इंसाफ किसे कहा जाए?

Kranti Kumar: Duty पहले, Blood बाद में

क्रांति कुमार एक ऐसा police officer है जो किताबों में लिखे आदर्शों से बाहर निकलकर उन्हें जीता है। South India की पोस्टिंग, गाँव की सादगी, कोयल से प्यार—सब कुछ किसी पुराने Hindi romance की तरह smooth चल रहा होता है।

लेकिन तभी कहानी twist लेती है। अचानक सामने आता है एक नाम— अमावस। और इसी नाम के साथ टूटता है Kranti का past, present और peace।

Amavas: राजनीति का असली विलेन

अमावस उर्फ विजय बहादुर कुंवर सिर्फ एक character नहीं, बल्कि power का नशा चढ़ा हुआ सिस्टम है। गरीबी से सत्ता तक का उसका सफर यह बताता है कि जब ethics रास्ते में गिर जाएँ, तो democracy कैसे dictatorship में बदलती है।

मिथुन चक्रवर्ती का यह अवतार इतना ठंडा, इतना निर्दयी है कि audience उससे नफरत भी करती है और डरती भी। और यहीं फिल्म जीत जाती है।

Women in Jallad: चुप रहकर भी भारी

‘जल्लाद’ की महिलाएँ loud नहीं हैं, लेकिन उनका असर गहरा है।

  • गायत्री—जिसका अपमान एक बेटे को जन्म देता है, बदले के लिए नहीं, इंसाफ के लिए।
  • तारा—जो महल में रहते हुए भी सच की कैदी नहीं बनती।
  • कोयल—जिसकी मासूमियत सत्ता की हवस से टकराती है।

यह फिल्म quietly बता देती है कि patriarchy का सबसे बड़ा डर औरत की चेतना होती है।

Revenge या Justice? यही असली लड़ाई है

जब क्रांति को सच पता चलता है, तो वह तुरंत बंदूक नहीं उठाता। वह system को देखता है, समझता है—और फिर तोड़ता है। वह अपने ही पिता की जान बचाता है, फिर उसी पिता को अदालत से पहले इंसाफ के कटघरे में खड़ा करता है। और आखिर में जो होता है, वह सिर्फ revenge नहीं— वह उस माँ की अधूरी चीख का जवाब है, जो सालों पहले दबा दी गई थी।

Music: Devotion + Desire का 90s Mix

Anand-Milind का music फिल्म के mood को पूरी तरह support करता है। भक्ति हो या बिछड़न, प्रेम हो या प्रतिशोध—हर गाना scene को आगे बढ़ाता है, रोकता नहीं। “जय जय जय काली” जैसे ट्रैक फिल्म की आत्मा को आवाज़ देते हैं।

क्यों याद रखी जाती है ‘जल्लाद’?

क्योंकि यह फिल्म साफ-साफ कहती है:

“सत्ता सबसे खतरनाक तब होती है, जब उसके पास शर्म नहीं बचती।”

मिथुन का negative role आज भी reference point माना जाता है— और यही वजह है कि जल्लाद एक cult political revenge drama बन चुकी है।

‘जल्लाद’ (1995) ने सिर्फ बॉक्स ऑफिस पर नहीं, बल्कि award circuits में भी गहरी छाप छोड़ी। फिल्म में अमावस उर्फ विजय बहादुर कुंवर के खौफनाक किरदार के लिए मिथुन चक्रवर्ती को दो बड़े सम्मान मिले—

41वां फिल्मफेयर पुरस्कार
Confirm: Best Performance in a Negative Role

Screen Award
Confirm: Best Actor in a Negative Role

यह उपलब्धि मिथुन के करियर के सबसे dark और powerful phases में गिनी जाती है।

Amavas: जब Villain ही फिल्म की रीढ़ बन गया

‘जल्लाद’ में मिथुन ने पहली बार ऐसा खलनायक निभाया, जो सिर्फ villain नहीं बल्कि system का चेहरा था— भ्रष्ट राजनीति, सत्ता की हवस और इंसानियत की हत्या।

Critics और audience दोनों इस बात पर एकमत थे कि shows चुरा ले जाने वाला किरदार hero का नहीं, villain का था

Double Role, Double Impact

फिल्म की खास बात यह रही कि मिथुन ने ईमानदार पुलिस ऑफिसर (Kranti Kumar) और निर्दयी राजनेता (Amavas) दोनों किरदार निभाए। लेकिन irony यही रही कि awards पॉजिटिव रोल को नहीं, बल्कि खलनायकी की परफेक्शन को मिले।

Awards That Changed the Narrative

इन अवॉर्ड्स के साथ मिथुन चक्रवर्ती उस rare league में शामिल हो गए, जहाँ negative roles को सिर्फ गाली खाने वाला किरदार नहीं बल्कि acting benchmark माना जाने लगा।

‘जल्लाद’ के बाद Bollywood ने villains को लिखना भी थोड़ा सीरियस लिया।

Hero बना अच्छा, Villain बना महान

90s का सिनेमा साफ कह रहा था— “अच्छा आदमी ताली पाता है, लेकिन बुरा आदमी अवॉर्ड ले जाता है।” और मिथुन ने यह बात दो ट्रॉफियों के साथ साबित कर दी।

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