
मिडिल ईस्ट का सियासी तापमान वैसे ही खौल रहा था, लेकिन तेहरान से आई एक घोषणा ने इस उबाल को और तेज कर दिया। ईरान ने जैसे ही अपने नए सुप्रीम लीडर का ऐलान किया, कुछ ही देर बाद इजरायल की ओर मिसाइलों की पहली लहर दाग दी गई। यह सिर्फ सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि नए नेतृत्व की तरफ से दुनिया को भेजा गया सीधा संदेश था कि तेहरान की रणनीति अब और आक्रामक हो सकती है।
तेहरान की सत्ता पर मोजतबा खामेनेई की एंट्री
ईरान की सत्ता अब अयातुल्ला मोजतबा खामेनेई के हाथ में आ गई है। वे दिवंगत नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के बेटे हैं और लंबे समय से सत्ता के गलियारों में प्रभावशाली माने जाते रहे हैं।
नए सुप्रीम लीडर के तौर पर उनकी नियुक्ति ऐसे वक्त हुई है जब पूरा मिडिल ईस्ट पहले से ही युद्ध जैसी स्थिति में खड़ा है।
पद संभालते ही इजरायल पर मिसाइलों की बौछार
ईरान के सरकारी मीडिया नेटवर्क IRIB के मुताबिक नए नेता के पद संभालने के तुरंत बाद इजरायल की ओर मिसाइलों की पहली खेप दागी गई।
सरकारी चैनलों पर जारी तस्वीरों में मिसाइल लॉन्च होते हुए दिखाए गए, जिन्हें तेहरान ने “नए नेतृत्व की रणनीतिक प्रतिक्रिया” बताया है।
यह कदम साफ संकेत देता है कि सत्ता परिवर्तन के साथ ईरान अपनी सैन्य आक्रामकता कम करने के मूड में नहीं है।
नियुक्ति से पहले ही इजरायल की खुली चेतावनी
दिलचस्प बात यह है कि नए सुप्रीम लीडर की घोषणा से पहले ही इजरायल ने सख्त चेतावनी जारी कर दी थी। इजरायली सेना ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर फारसी भाषा में पोस्ट कर कहा था कि अली खामेनेई के किसी भी संभावित उत्तराधिकारी को भी निशाना बनाया जा सकता है।

यह बयान उस समय आया था जब ईरान की धार्मिक संस्था Assembly of Experts नए नेता के चयन के लिए बैठक करने वाली थी।
अमेरिका भी बना रहा नई रणनीति
मिडिल ईस्ट के इस तेजी से बदलते समीकरण के बीच अमेरिका भी अपनी रणनीति पर काम कर रहा है। रिपोर्ट्स के मुताबिक अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ईरान के समृद्ध यूरेनियम भंडार को अपने नियंत्रण में लेने के विकल्प पर विचार कर रहे हैं।
बताया जा रहा है कि इस योजना में स्पेशल फोर्स के जरिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम को सीधे निशाना बनाने की रणनीति भी शामिल हो सकती है।
खामेनेई की मौत के बाद सत्ता में आया खालीपन
ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई करीब 37 साल तक देश की सत्ता के केंद्र में रहे। 28 फरवरी को तेहरान में हुए हमले में उनकी मौत के बाद सत्ता में अचानक खालीपन पैदा हो गया था। करीब एक हफ्ते तक नया नेता तय नहीं हो पाया और तब तक देश की कमान तीन सदस्यीय समिति को सौंपी गई थी।
युद्ध जैसे हालात में नेतृत्व को लेकर हुई इस देरी ने ईरान के भीतर भी बेचैनी बढ़ा दी थी।
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